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Jharkhand

DHANBAID से धनबाद तक: 70 साल का सफर, क्या पाया-क्या खोया?जानिए पूरी कहानी

Satya Bhushan Singh   Dhanbad
Satya Bhushan Singh Dhanbad
Senior Journalist

धनबाद(DHANBAD) | धनबाद जिला शनिवार को 70 साल का हो गया.  24 अक्टूबर 1956 में  धनबाद को अलग जिला बनाया गया था.  70 साल के अपने जीवन में धनबाद में कई बदलाव देखे।  देश की कोयला राजधानी के रूप में विख्यात धनबाद अपने 70 साल के जीवन में कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण को भी देखा।  बिहार से कटकर अलग राज्य बनने का भी गवाह रहा.  पंडित जवाहरलाल नेहरू के "ड्रीम प्रोजेक्ट" सिंदरी खाद कारखाने को भी बंद होते देखा।  उसकी जगह पर हर्ल कंपनी की शुरुआत का भी गवाह रहा.  आईएसएम को आईआईटी  बनते भी देखा।  धनबाद हवाई अड्डा को शुरू होते और बंद होते भी देखा।  धनबाद माफिया उन्मूलन अभियान का भी साक्षी रहा.  माफियाओं के समानांतर व्यवस्था को भी देखा तो माफियाओं के टूटते  वर्चस्व को भी नजदीक से महसूस किया।  

धनबाद से कटकर ही बोकारो जिला बना था 

देश की प्रसिद्ध खाद्यान  मंडी, झरिया की बिगड़ी हालत को भी देखा।  एयरपोर्ट के लिए आंदोलन का भी गवाह बन रहा है.  धनबाद से कटकर बोकारो जिला को भी बनते देखा। कोयला उद्योग में आउट सोर्स कंपनियों के बढ़ते वर्चस्व को भी देख रहा है.  धनबाद में स्वतंत्रता आंदोलन के समय महात्मा गांधी को भी झरिया में देखा था.  महात्मा गांधी को झरिया में रामजस अग्रवाल ने ब्लैंक  हुंडी दी थी.  उस समय हुंडी  का प्रचलन था.  यह  हुंडी देश के किसी भी बड़े बाजार में बनाया जा सकता था.  धनबाद का इतिहास गौरवशाली रहा है, लेकिन इतिहास के हिसाब से धनबाद का  वर्तमान  बहुत समृद्ध नहीं हुआ.  धनबाद ने  बिहार के मुख्यमंत्री से लेकर केंद्र में मंत्री तक दिए.  कई लोग धनबाद की राजनीति करते हुए फर्श से अर्श  तक पहुंचे, आज धनबाद अपने जीवन का 70 साल पूरा कर रहा है.  कभी धनबाद में नगर पालिका थी, आज नगर निगम काम कर रहा है.  

धनबाद में 1928 से पुलिस जिला काम कर रहा था 

धनबाद जिले का गठन  1956 में तत्कालीन मानभूम जिले के सदर उपमंडल के चास और चंदनकियरी पुलिस स्टेशनों को अलग करके किया गया था.  धनबाद 1928 से पुलिस जिला है.  1971 के बाद बिहार राज्य में हुए जिलों के पुनर्गठन का धनबाद जिले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा था.   1991 में, धनबाद जिले के चास उपमंडल और गिरिडीह जिले के बेरमो उपमंडल को अलग करके बोकारो जिले का गठन किया गया था.  धनबाद कभी 'धान' की धरती था .   धान उगलती धरती के कारण ही यहां के गांव-कस्बों का नाम खेतों की प्रकृति के अनुसार निर्धारित किए गए थे.  मसलन कनाली, बाइद, बहियार , टांड़ आदि.  रामकनाली, बहियारडीह, छाताबाद, छाताटांड़..आदि उदहारण हो सकते है.  यहां धान की उपज खूब होती थी.  दामोदर, कतरी, कारी, खोदो..नदियों से घिरा था इलाका, पर्वत-पहाड़, वन-पाथर से आच्छादित एक मनोरम स्थल था धनबाद. बहियार खेतों में पानी सालोभर रहता था, बाइद खेतों की सिंचाई नदियों के पानी से होती थी.  पहले धनबाद मानभूम जिले का हिस्सा था, उस समय बाइद खेत के अनुरूप धनबाद का नाम 'धनबाइद' था. मुख्यालय पुरुलिया में था.  वर्तमान में पुरुलिया पश्चिम बंगाल के हिस्से में है. 

कैसे DHANBAID से बदल कर नाम पड़ा DHANBAD 

 धनबाद में  सहायक उपायुक्त ADC बैठते थे, ICS लुबी साहब ADC थे.  उन्होंने ही DHANBAID से  शब्द को विलोपित कर शहर का नाम  ..DHANBAD रखा.  भाषा के नाम पर भी यह शहर विवाद झेल चुका  है. जो विवाद गहराया था ,वह बंगाल और बिहार के मुख्यमंत्री द्वय डॉ विधान चन्द्र राय और श्रीकृष्ण सिंह की उदार भावना और पहल के बिना खत्म होना मुश्किल था.   सन' 1905 में बंग भंग आंदोलन हुआ , 1911 में इसे खारिज़ किया गया.  वर्ष'  1912 में मानभूम को बिहार-उड़ीसा के अधीन रखा गया.  1921 में मानभूम कांग्रेस का गठन हुआ , निवारण चन्द्र दासगुप्ता अध्यक्ष और अतुल चन्द्र घोष सचिव बने.   भाषा आंदोलन शुरू हुआ , वर्ष' 1948 में अध्यक्ष और सचिव समेत कांग्रेस के 35 सदस्यों ने हिंदी के विरोध में इस्तीफ़ा दिया.  बांग्ला के समर्थन में  लोक सेवक संघ का गठन हुआ, कोलकाता मार्च हुआ. पाखेरबेड़ा का यह आंदोलन देश भर में चर्चित हुआ । बांग्ला के समर्थन में सत्याग्रह  शुरू हुए.  अब दोनों भाषाएं आमने-सामने थी .  बाद में बंगाल के मुख्यमंत्री डॉ विधान चन्द्र राय और बिहार के सीएम श्रीकृष्ण सिंह ने मिलकर राह आसान किया. 
 
1956 के 24 अक्टूबर को ही मानभूम से पुरूलिया अलग हुआ था 
 
1956 के 24 अक्टूबर को 2007 वर्गमील क्षेत्र , 16 थाना मिलाकर मानभूम से पुरूलिया को अलग कर बंगाल का हिस्सा बनाया गया, जबकि धनबाद को बिहार में रखा गया.  उस समय बोकारो भी धनबाद का हिस्सा था.  बाद में  टिस्को के आग्रह पर बंगाल के मुख्यमंत्री डॉ विधान चन्द्र राय ने धनबाद के साथ चांडिल , ईचागढ़ और पटमदा को  भी बिहार के हवाले किये. मानभूम कल्चर आज भी धनबाद के गांवों में देखने को मिलता है. . 24 अक्टूबर '1956 को बंगाल  के मानभूम से काटकर धनबाद को जिला बनाया गया था. हालांकि ;1991 में इसके भी दो भाग हुए और बोकारो जिला धनबाद से अलग हो गया. उस वक्त तेज तर्रार अधिकारी अफजल अमानुल्ला धनबाद के डीसी थे. अपने  जीवन में धनबाद पाया कम ,उसकी हकमारी अधिक हुई ,हालांकि शहर और ज़िले का विकास  हुआ जरूर है लेकिन गति की कमी पहले भी थी और आज भी है. 

मांग होती रही लेकिन हकमारी भी साथ -साथ होती रही 

धनबाद की आंचल  में आई आई टी (आई एस एम ),सिफर ,डीजीएमए स ,सीएमपीएफ के मुख्यालय है ,वही बीसीसीएल ,इ सील सहित सेल  की खदाने है. 2017 में धनबाद को विश्वविधालय भी मिला. धनबाद जिसका हकदार था ,उसकी भी सूची  लम्बी है. खूब हो हल्ला के बाद भी धनबाद को एयर कनेक्टिविटी नहीं मिला. धनबाद इसकी  आहर्ता पूरी करता है ,लेकिन राजनितिक कारणों से इस ज़िले को लाभ से वंचित रखा गया. एयर पोर्ट ,हम कह सकते है कि धनबाद से छीन कर देवघर को दे दिया गया. जब यहाँ के लोग मांग तेज करते है, तो लॉलीपोप थमा दिया जाता है. धनबाद को अभी तक कोई सरकारी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल नहीं मिल पाया. धनबाद के साथ नाइंसाफी कर एम्स  को भी देवघर ले जाया गया. धनबाद में खिलाड़ियों की कमी नहीं है. ताकतवर क्रिकेट और फुटबॉल सहित अन्य खेलो का संघ भी है. मांग भी होती है ,रांची से लेकर दिल्ली तक. ट्रैफिक यहाँ के लिए  बड़ी परेशानी बनी हुई है. शहर का जिस तेजी से विस्तार हुआ ,उस अनुपात में सडको या फ्लाईओवर का निर्माण नहीं हुआ. पार्किंग की भी कोई कारगर उपाय नहीं किये गए. 1972 में जहा ज़िले की जनसंख्या 12 लाख के आसपास थी वही अभी की आवादी 28 लाख से अधिक है.