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बिनोद बिहारी महतो जयंती विशेष: जब तक रहे शिक्षा को "हथियार बनाने की सीख  देते रहे, पढ़ो और लड़ो’ आज भी उनके विचारों की पहचान

Satya Bhushan Singh   Dhanbad
Satya Bhushan Singh Dhanbad
Senior Journalist

TNP DESK-: बिनोद बाबू एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक संस्था  और विचार थे. झारखंड के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में कुछ ऐसे नाम हैं, जिनका योगदान केवल किसी एक आंदोलन या राजनीतिक दल तक सीमित नहीं रहा  . बिनोद बिहारी महतो भी उन्हीं नामों में शामिल थे. . शिक्षा से सामाजिक बदलाव लाने को  माध्यम बनाने वाले बिनोद बाबू ने अपने जीवन में वकालत, समाज सुधार, शिक्षा और झारखंड आंदोलन को एक साथ आगे बढ़ाया. उनका दिया नारा ‘पढ़ो और लड़ो’ आज भी उनके विचारों की पहचान बना हुआ है. 23 सितंबर 1923 को धनबाद जिले के बलियापुर प्रखंड के बड़ादाहा गांव में जन्मे बिनोद बिहारी महतो की आज 103वीं जयंती मनाई जा रही है.

किसान परिवार में जन्मे और लगातार आगे बढ़ते चले गए 

बिनोद बिहारी महतो का एक किसान परिवार के घर जन्मे  थे.  अपने  शुरुआती जीवन सामान्य परिस्थितियों में बिताए. उन्होंने  धनबाद के हाई  स्कूल से मैट्रिक की पढ़ाई की. इसके बाद कुछ समय शिक्षक के रूप में काम किया और आपूर्ति विभाग में क्लर्क की नौकरी भी की. लेकिन नौकरी तक सीमित रहना उन्हें स्वीकार नहीं था. आगे की पढ़ाई करते हुए उन्होंने कानून (लॉ) की शिक्षा हासिल की और धनबाद में वकालत शुरू किया. बाद में उन्होंने विस्थापन और जमीन से जुड़े मामलों में गरीबों और उनसे जुड़े प्रभावित लोगों की वकालत करते हुए  पैरवी भी की. बिनोद बाबू का मानना था कि समाज को मजबूत बनाने के लिए सबसे जरूरी है शिक्षा. इसी सोच ओर बदलाव के साथ उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के प्रचार प्रसार पर जोर दिया. उन्होंने सामाजिक कुरीतियों, अशिक्षा और महाजनी शोषण के खिलाफ आवाज उठाई. 

1960 के दशक में शिवाजी समाज का भी किया था गठन 

1960 के दशक में शिवाजी समाज का गठन किया, जिसमें सामाजिक जागरूकता, नशा मुक्ति,  बाल विवाह जैसी  कुरीतियों का पुरजोर विरोध का अभियान चलाया और लोगों को संगठित करने का प्रयास किया. उनका संदेश साफ था कि अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए पहले समाज को शिक्षित और जागरूक होना होगा.इसी सोच से उनका प्रसिद्ध नारा निकला—‘पढ़ो और लड़ो.’ यह केवल नारा नहीं था, बल्कि उनके सामाजिक आंदोलन का आधार था. शिक्षा को उन्होंने अधिकारों की समझ और सामाजिक चेतना से जोड़ा.बिनोद बिहारी महतो का नाम अलग झारखंड राज्य के आंदोलन के इतिहास से भी गहराई से जुड़ा है. झारखंड के दिशोम गुरु शिबू सोरेन से मुलाकात और 4 फरवरी 1973 को धनबाद के गोल्फ ग्राउंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा के गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही. उनके साथ शिबू सोरेन और एके राय समेत कई नेता जुड़े. बाद में झारखंड आंदोलन ने अलग राज्य की मांग को व्यापक राजनीतिक आंदोलन का रूप दिया.

आंदोलन को सामाजिक स्तर पर जोड़ना उनकी प्राथमिकता रही 

उनकी राजनीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष जल-जंगल-जमीन, विस्थापन और स्थानीय लोगों के अधिकारों से जुड़े मुद्दे अहम रहे. उन्होंने आंदोलन को केवल राजनीतिक मंच तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सामाजिक स्तर पर लोगों को जोड़ने की कोशिश की.बिनोद बिहारी महतो ने सक्रिय राजनीति में भी अपनी पहचान बनाई. वे 1980 में टुंडी विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए. इसके बाद 1985 में भी विधानसभा पहुंचे और बाद में सिंदरी क्षेत्र से विधायक रहे. वर्ष 1991 में वे गिरिडीह लोकसभा क्षेत्र से सांसद भी निर्वाचित हुए. हालांकि सांसद बनने के कुछ ही समय बाद 18 दिसंबर 1991 को दिल्ली में इलाज के दौरान उनका निधन हो गया. उनकी उम्र उस समय 68 वर्ष थी

शिक्षण संस्थानों के रूप में आज भी जीवित हैं  बिनोद बाबू 
 
बिनोद बिहारी महतो के निधन को तीन दशक से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन झारखंड में उनकी विरासत आज भी दिखाई देती है. उनके नाम पर शिक्षण संस्थान हैं. धनबाद में बिनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय भी उनके नाम पर है. बलियापुर स्थित बिनोद बिहारी महतो कॉलेज और अन्य शिक्षण संस्थानों के माध्यम से उनकी शिक्षा संबंधी सोच को याद किया जाता है.उनके माता और पिता के नाम पर आज भी हाई स्कूल चल रहे है. लोग कहते हैं कि आज उनकी 103वीं जयंती पर उन्हें याद करना केवल एक राजनीतिक नेता की जयंती मनाना नहीं है. यह उस विचार को याद करना भी है जिसमें शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और अधिकारों की लड़ाई को एक-दूसरे से जोड़ा गया था. झारखंड के सामाजिक इतिहास में बिनोद बिहारी महतो की यही पहचान उन्हें अलग स्थान देती है.

रिपोर्ट -प्रकाश महतो