Jharkhand

बड़ा सवाल: कोयलांचल कब तक "पेंडुलम" की तरह झूलता रहेगा? कब चेतेगी बीसीसीएल,कब जगेगी सरकार?

Satya Bhushan Singh   Dhanbad
Satya Bhushan Singh Dhanbad
Senior Journalist

धनबाद(DHANBAD)|  कोलियरी क्षेत्र में रहने वाले लोगों को खुद नहीं मालूम कि उनके पैरों के नीचे की जमीन कब धंस जाएगी? कब जमीन फट जाएगी, कब घर में दरार आ जाएगी और कब देखते ही देखते पूरा आशियाना जमीन में समा जाएगा? यहां रहने वाले लोगों के सिर पर हर वक्त जान का खतरा मंडराता रहता है.  दिन हो या रात, भू-धंसान  की चिंता लोगों को सताती रहती है। घटना होने के बाद नेता पहुंचते जरूर हैं, मौके पर पहुंचकर लोगों से मिलते हैं, हालात देखते हैं और अपने भाषणों में एक-दूसरे पर दोषारोपण कर निकल लेते है.  आश्वासन दिए जाते हैं और कार्रवाई की बातें होती हैं, लेकिन कुछ दिन बीतने के बाद वही स्थिति फिर सामने आ जाती है.  लोगों का कहना है कि घटना के बाद किए जाने वाले वादे धरातल पर नजर नहीं आते. 

मकान  क्षतिग्रस्त होने और जान गवांए लोगो की सूची  लम्बी है 

कोयलांचल के अलग-अलग इलाकों में अब तक 100 से भी अधिक घर क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। कहीं घर जमीन में धंस गए, तो कहीं जमीन फट गई। कहीं अचानक जोरदार आवाज के साथ भू-धंसान  हुआ, तो कहीं जमीन में लंबी-लंबी दरारें पड़ गई.  कई घरों की दीवारें फट  गईं, भू-धंसान  और उससे प्रभावित घरों की संख्या को आंकड़ों में बताना भी मुश्किल है.  क्योंकि इस तरह की घटनाएं अब इन इलाकों में आम होती जा रही हैं और कई घटनाओं में लोगों की जान तक जा चुकी है. कुछ दिन पूर्व हुई भू-धंसान  की घटना से प्रभावित कुछ परिवारों को वहां मौजूद सामुदायिक भवन में अस्थायी रूप से ठहराया गया था। लोगों को लगा था कि कम से कम सिर छिपाने के लिए एक सुरक्षित जगह मिल गई है। लेकिन 16 सितंबर की देर शाम हुई भू-धंसान  की घटना ने इस आसरे को भी छीन लिया।  सामुदायिक भवन भी क्षतिग्रस्त हो गया.  क्षेत्र की सड़कें भी कई जगहों पर इस तरह टूटती और धंसती दिखाई दे रही हैं, मानो जमीन के टुकड़े-टुकड़े हो गए हों. 

सैकड़ा नहीं ,हज़ारो में विस्थापित हुए है लोग ,कोई देखने वाला नहीं 

स्थानीय लोगों के अनुसार अब तक करीब 500 से अधिक लोग बेघर हो चुके हैं। कई परिवारों के पास अपना कोई सुरक्षित आशियाना नहीं बचा है। छाताबाद में 7 अगस्त को हुई घटना के बाद करीब 18 दिनों तक आंदोलन चला। आंदोलन के बाद बीसीसीएल प्रबंधन की ओर से समुचित पुनर्वास, प्रभावित स्थल का सर्वे और जमीन की समुचित भराई का आश्वासन दिया गया था.  लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि समय बीतने के बाद भी ये आश्वासन महज छलावा साबित हो रहे हैं। जमीन की स्थिति जस की तस बनी हुई है. सामुदायिक भवन के क्षतिग्रस्त होने के बाद प्रभावित परिवारों को अब अस्थायी टेंट में रहने को मजबूर होना पड़ रहा है। बारिश, गर्मी और मौसम की मार के बीच परिवार अपने छोटे बच्चों और सामान के साथ किसी तरह दिन काट रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर इन लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?

घटनाएं सिर्फ कतरास के छाताबाद तक सीमित नहीं ,झरिया तक पहुंच गई है 

भू-धंसान  की घटनाएं सिर्फ कतरास के छाताबाद तक सीमित नहीं है.  कतरास के टांडाबाड़ी, सिजुआ, केसलपुर और रामकनाली में भी भू-धंसान  की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। गोविंदपुर क्षेत्र की बात करें तो न्यू आकाश किनारी, केलुडीह और भुईयां बस्ती में भी कई जगह गोफ बनने और जमीन धंसने की घटनाएं हुई है. वहीं कुसुंडा के केंदुआडीह  क्षेत्र, गोधर  6 नंबर और हवा चानक सहित कई इलाकों में भी जमीन धंसने की घटनाएं लोगों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई हैं। सिजुआ की  पटिया बस्ती भी इससे अछूती नहीं है. स्थानीय प्रतिनिधियों और प्रभावित इलाकों में रहने वाले लोगों का कहना है कि घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। लोग अपनी जान गंवा रहे हैं और परिवार बेघर हो रहे है.  

अधिकारी भी पहुंचते हैं ,नेता भी आते है लेकिन मिलता है केवल भरोसा 

बड़े-बड़े नेता मौके पर पहुंचते हैं, अधिकारियों और प्रबंधन के लोग भी आते हैं। आंदोलन के बाद बीसीसीएल की ओर से मिट्टी भराई और पुनर्वास का आश्वासन भी दिया गया, लेकिन लोगों को धरातल पर उसका असर दिखाई नहीं दे रहा। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इन घटनाओं की जिम्मेदारी कौन लेगा? कब तक लोग डर के साये में रहेंगे? कब तक किसी नई घटना के बाद राहत और मुआवजे की बातें होती रहेंगी? और कब इन परिवारों को स्थायी और सुरक्षित आशियाना मिलेगा? जहां लोगों को विस्थापित कर ले जाने की तैयारी की जा रही है, वहां भी एक बड़ी चिंता रोजगार की है। वर्षों से कोयलांचल में रहकर अपनी रोजी-रोटी चलाने वाले लोगों को यदि दूसरी जगह बसाया जाता है तो वहां उनके रोजगार का क्या होगा, यह सवाल भी उतना ही बड़ा है।

बड़ा सवाल -कब तक लोगों की जान का जोखिम बना रहेगा 
 
लोगों का कहना है कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी यहीं बिताई है। घर छोड़कर जाना आसान नहीं है। लेकिन जान बचाने के लिए सुरक्षित जगह भी जरूरी है।
कोयलांचल के इन इलाकों में जमीन के ऊपर जिंदगी चल रही है, लेकिन जमीन के नीचे का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। लोगों की मांग साफ है—सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि स्थायी समाधान चाहिए। पुनर्वास, सुरक्षित आवास, रोजगार और प्रभावित जमीन की समुचित भराई के साथ ऐसी व्यवस्था चाहिए, जिससे लोगों को हर सुबह यह डर लेकर न उठना पड़े कि आज उनके पैरों के नीचे की जमीन सुरक्षित है या नहीं।

रिपोर्ट -प्रकाश महतो