धनबाद (DHANBAD): भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT-ISM) धनबाद ने शोध और नवाचार के क्षेत्र में एक और बड़ी उपलब्धि अपने नाम की है. संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित 'फोर लोब्ड स्वर्ल इंड्यूसिंग पाइप' (Four Lobed Swirl Inducing Pipe) तकनीक को भारत सरकार ने भारतीय पेटेंट प्रदान किया है. यह नई तकनीक पाइपलाइन के माध्यम से द्रव (Fluid) और स्लरी (Slurry) के परिवहन को अधिक प्रभावी, ऊर्जा-कुशल और कम खर्चीला बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.
इस अत्याधुनिक तकनीक को IIT (ISM) के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के डॉ. अजीत कुमार, डॉ. पंकज कुमार गुप्ता, डॉ. राम कृष्ण राठौर और डॉ. निरंजन कुमार की शोध टीम ने विकसित किया है. करीब चार वर्षों तक चले अनुसंधान, प्रयोग और तकनीकी परीक्षण के बाद भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय ने 27 जुलाई 2026 को भारतीय पेटेंट अधिनियम, 1970 के तहत इस तकनीक को पेटेंट प्रदान किया.
शोधकर्ताओं के अनुसार कोयला, खनन, तेल एवं गैस, रासायनिक उद्योग और ताप विद्युत संयंत्रों में पाइपलाइन के जरिए द्रव और स्लरी के परिवहन के दौरान अक्सर ठोस कणों का जमाव, अधिक दबाव हानि (Pressure Loss) और ऊर्जा की अतिरिक्त खपत जैसी समस्याएं सामने आती हैं. नई तकनीक इन चुनौतियों को काफी हद तक कम करने में सक्षम होगी.
'फोर लोब्ड स्वर्ल इंड्यूसिंग पाइप' की विशेष डिजाइन पाइप के भीतर द्रव में नियंत्रित स्वर्ल मोशन (Swirl Motion) उत्पन्न करती है. इससे द्रव और ठोस कण बेहतर तरीके से मिश्रित रहते हैं और पाइपलाइन में समान रूप से प्रवाहित होते हैं. इसके परिणामस्वरूप ठोस कणों के जमाव की संभावना घटती है, दबाव हानि कम होती है और ऊर्जा की बचत होती है. साथ ही पाइपलाइन की कार्यक्षमता बढ़ने के कारण रखरखाव पर होने वाला खर्च भी कम हो सकता है.
इस तकनीक के लिए वर्ष 2022 में पेटेंट आवेदन किया गया था, जिसे विस्तृत तकनीकी मूल्यांकन के बाद मंजूरी मिली. शोधकर्ताओं का मानना है कि यह उपलब्धि उद्योगों के साथ तकनीकी सहयोग, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और व्यवसायीकरण के नए अवसर खोलेगी. यह तकनीक खनन, लौह अयस्क एवं खनिज स्लरी परिवहन, तेल एवं गैस पाइपलाइन, रासायनिक संयंत्र, ताप विद्युत परियोजनाएं, जल आपूर्ति प्रणाली, अपशिष्ट जल शोधन, हीट एक्सचेंजर, मिक्सिंग सिस्टम और पर्यावरण अभियांत्रिकी जैसे कई क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह नवाचार औद्योगिक उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ ऊर्जा संरक्षण और पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों को भी नई दिशा देगा.
