धनबाद(DHANBAD): धनबाद से सटे बर्नपुर की अब तकदीर बदल रही है. औद्योगिक इतिहास का नया अध्याय की तैयारी शुरू हो गई है. भारी अर्थ मूविंग मशीनों की गड़गड़ाहट सुनाई देने लगी है. अब पूरी तरह से इलाके का परिदृश्य बदल गया है. यह यूनिट जब उचाइयां छुएगी तो झारखंड को भी फ़ायदा देगी। इसकी नींव 1918 में रखी गई थी. अब इस ऐतिहासिक जमीन पर पूर्वी भारत की सबसे बड़ी ग्रीन फील्ड इस्पात विस्तार परियोजना आकार लेने जा रही है. दुनिया की सबसे आधुनिक और विशाल ब्लास्ट फर्नेस स्थापित होगी। बर्नपुर इस्पात कारखाने की कल्पना सर राजेंद्र नाथ मुखर्जी तथा उनके सहयोगियों ने की थी. यह अलग बात है कि ढांचे अब पुराने हो गए थे, अब उनको हटाकर नए इस्पात संयंत्र का निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो गई है.
नए परिवर्तन से ऑटोमोबाइल हब का सपना भी पूरा हो सकता
इस परिवर्तन से ऑटोमोबाइल हब का सपना भी पूरा हो सकता है. सूत्रों के अनुसार आने वाले समय में यहां उच्च गुणवत्ता वाले ऑटोमोबाइल ग्रेड इस्पात का उत्पादन शुरू हो सकता है. फिलहाल देश में इलेक्ट्रिक वाहनों के निर्माण के संयंत्रों की संख्या बहुत सीमित है. ऐसे में माना जा सकता है कि बर्नपुर में बनने जा रहा आधुनिक इस्पात संयंत्र इलेक्ट्रिक वाहन और स्पेयर पार्ट्स निर्माता को भी आकर्षित कर सकता है. इस कारखाने का एक लंबा इतिहास है. बताया जाता है कि 1890 के दशक में एक ब्रिटिश इंजीनियर के साथ मिलकर मुखर्जी ने मार्टिन एंड कंपनी की स्थापना की थी. मार्टिन के निधन के बाद मुखर्जी इसके एकमात्र साझेदार बने और बाद में बर्न एंड कंपनी का अधिग्रहण कर दोनों को मिलाकर एक औद्योगिक कंपनी का निर्माण किया।
एक समय तो विदेश से तकनीक सीखने आते थे इंजीनियर
जैसे-जैसे कारोबार बढ़ा तो इस्पात उद्योग की तरफ उनका झुकाव हुआ. फिर उन्होंने इंडियन एंड आयरन स्टील कंपनी (इस्को ) की स्थापना की. यह कारखाना भी खूब चल निकला और उसके बाद तकनीक सीखने के लिए विदेश से लोग आने लगे. बाद में स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (सेल) का यह हिस्सा बन गया. अब इसके आधुनिकीकरण का प्रोजेक्ट चालू हो गया है. आधुनिकीकरण प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य उच्च गुणवत्ता वाले ऑटो मोबाइल ग्रेड स्टील और विशेष प्लेटो का उत्पादन करना है. इससे ऑटोमोबाइल ,मशीन निर्माण इंजीनियरिंग और स्टील फैब्रिकेशन जैसे उद्योगों के लिए नए अवसर पैदा हो सकते है.
कोलकाता बंदरगाह की उपलब्धता से होगी आसानी
कोलकाता बंदरगाह की उपलब्धता और पूर्वी एशिया के देशों से कच्चा माल तथा पुर्जों की आसान आपूर्ति भी इस दिशा में सहायक साबित हो सकती है. पुराने लोग बताते हैं कि 1937 में राजेंद्र नाथ मुखर्जी के निधन के बाद उनके पुत्र ने इस औद्योगिक विरासत को आगे बढ़ाया। 1953 में उन्होंने विस्तार के लिए विश्व बैंक से 3.15 करोड़ अमेरिकी डॉलर के ऋण समझौते पर हस्ताक्षर किया। लोग बताते हैं कि यह पहला मौका था, जब विश्व बैंक ने किसी निजी औद्योगिक परियोजना को वित्तीय सहायता दी थी. फिर 1956 में दूसरा समझौता भी हुआ. आज बर्नपुर का इस्पात कारखाना पहले से कहीं अधिक आधुनिक हो चुका है और इसका स्वामित्व भी अब सार्वजनिक क्षेत्र में आ गया है.
