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Jharkhand

EXPLAINER: धनबाद शिक्षा विभाग में ट्रांसफर -पोस्टिंग का बड़ा "खेल", न सरकार का भय और न नियम का डर,अब किस पर गिरेगी गाज ? 

Satya Bhushan Singh   Dhanbad
Satya Bhushan Singh Dhanbad
Senior Journalist

 धनबाद(DHANBAD): धनबाद का  शिक्षा विभाग एकाएक सुर्खियों में आ गया है.  निरसा विधायक ने सवाल उठाकर पूरे विभाग की कार्य प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है. आखिर पूर्व DSE ने कथित रूप से सरकार के नियमों को दरकिनार कर कैसे मनमानी की ? सूत्र बताते हैं कि तत्कालीन डीएसई के कार्यकाल में शिक्षा विभाग में ट्रांसफर- पोस्टिंग का जो कथित तौर पर बड़ा "खेल" हुआ,  वह अब विभाग के गले की फांस  बन गई है.  बिना किसी आवेदन के मनमानी ढंग से शिक्षकों की ट्रांसफर- पोस्टिंग की गई है. धीरे धीरे इसके सबूत बाहर आने लगे हैं. कारस्तानी ऐसी हुई है ,  कि जहां 200 से अधिक बच्चे हैं, वहां शिक्षक दो हैं और जहां 100 बच्चे हैं ,वहां शिक्षक 10 से अधिक हैं.  शहरी क्षेत्र के स्कूलों में तो इसकी भरमार हैं.  

पूर्व DSE  तक क्यों और कैसे पहुंच सकती है जाँच की आंच 

अब शिक्षा विभाग में कार्रवाई शुरू हुई है, तो पूर्व DSE  तक जांच की आंच पहुंच सकती है.   बताया गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई है,आखिर इसके लिए जिम्मेवार कौन है? जहां 294 बच्चे हैं ,वहां केवल दो शिक्षक हैं.  काला डाबर  के स्कूल का उदाहरण देकर सूत्र बता रहे हैं कि वहां 303 बच्चे हैं, लेकिन टीचर केवल चार है.  इसी तरह बरवा पूर्व में 294 बच्चों पर केवल दो शिक्षक है.  पलासी में 576 बच्चों पर केवल आठ शिक्षक है.  बुधुडीह  परसिया में 152 बच्चों पर दो शिक्षक है.  मध्य विद्यालय, सहराज  में 396 बच्चों पर केवल तीन टीचर है.  दूसरी ओर शहर के स्कूलों में शिक्षकों की भरमार है.  ऐसा क्यों हुआ, कैसे हुआ, आखिर सरकार के नियमों का पालन क्यों नहीं हुआ, पूर्व डीएसई  सरकार के नियम और कानून को क्यों दरकिनार कर दिया? यह अब एक बड़ा सवाल उभर कर सामने आया है.  यह अलग बात है कि जांच की प्रक्रिया शुरू होगी, तो इसकी आंच  उन तक भी पहुचेंगी। 

विभगीय कर्मचारी भी  बता रहे हैं पूरी कहानी 

विभगीय कर्मचारी भी अपनी गर्दन बचाने के लिए जानकारी देने से कोई परहेज नहीं कर रहे हैं ।  सूत्रों के अनुसार जनवरी 20 26 को स्थापना की बैठक में 134 शिक्षकों के तबादले का निर्णय हुआ था.  लेकिन उसके बाद बिना किसी प्रस्ताव के सैकड़ों   शिक्षकों की शहरी इलाकों में पोस्टिंग कर दी गई.  यह  अलग बात है कि फिलहाल वर्तमान डीएसई  शालिनी डुंगडुंग  के हस्ताक्षर से 91 शिक्षकों को उनके मूल विद्यालय में लौटा दिया गया है. उन्हें पांच नवंबर तक कार्यभार ग्रहण करने का आदेश दिया गया है.  लेकिन सवाल उठता है कि इतने दिनों तक बच्चों की पढ़ाई बाधित हुई, तो उसके लिए जिम्मेवार कौन है? आखिर क्यों ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों के साथ ऐसा खिलवाड़ किया गया? क्या कभी इसकी जांच पड़ताल नहीं हुई? इलाके के जनप्रतिनिधि क्या कर रहे थे? उनकी नाक के नीचे ट्रांसफर पोस्टिंग का खेल चल रहा था और वह चुप बैठे हुए थे? अब जाकर निरसा विधायक आंदोलन शुरू किया है, तो खलबली मची हुई है.  

जानिए शहरी इलाके में पोस्टिंग को क्यों उत्सुक  रहते है शिक्षक 

सवाल उठता है कि आखिर शिक्षक शहरी इलाके के स्कूल में पोस्टिंग लेने के लिए इतने उत्सुक  क्यों रहते हैं? ट्रांसफर- पोस्टिंग के लिए हर डिमांड क्यों पूरी करते हैं? इसके संबंध में सूत्र बताते हैं कि दरअसल निगम क्षेत्र में पदस्थापित शिक्षकों को 20% अतिरिक्त हाउस रेंट मिलता है.  यह  हाउस रेंट निगम क्षेत्र के 8 किलोमीटर बाहर तक के स्कूल के शिक्षकों को देने का नियम है.  ऐसे में शिक्षकों को अमूमन ₹10,000 तक की अतिरिक्त आय  हो जाती है.  ऐसे में वह ग्रामीण क्षेत्र के बजाय शहरी इलाकों में रहकर बच्चों को महंगे स्कूलों में पढ़ाना , बेहतर जिंदगी जीने  की बात सोचते है.  सूत्रों के अनुसार शहरी क्षेत्र में पदस्थापित शिक्षक अतिरिक्त मकान भाड़ा से ही भाड़े पर माकन  ले लेते हैं और अच्छे-अच्छे स्कूलों में बच्चों को पढ़ाते हैं. 

क्यों ग्रामीण क्षेत्र में नहीं जाने के लिए सबकुछ करते हैं  शिक्षक ?

 शिक्षक ग्रामीण क्षेत्र में जाने से परहेज करते हैं.  इसी का फायदा पूर्व DSE  द्वारा उठाए जाने की बात सामने आई है.  हालांकि , जांच अभी शुरू नहीं हुई है, जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, मामला "प्याज के छिलके" की भांति खुलता जाएगा .  अब आपके मन में सवाल होगा कि आखिर बच्चों के अनुपात में शिक्षकों की प्रति नियुक्ति का नियम क्या है? तो बताया जाता है कि 40 बच्चों पर एक शिक्षक का मानक सरकार की ओर से तय किया गया है.  मतलब जिस स्कूल में 200 बच्चे हैं, वहां कम से कम पांच शिक्षक होने चाहिए।  लेकिन ऐसा होता नहीं है.  ग्रामीण क्षेत्र के स्कूल कहीं एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं, तो कहीं स्कूलों पर बंदी का खतरा है.   शिक्षकों को भी लाभ था इसलिए उन लोगों ने भी शहरी क्षेत्र में पोस्टिंग के लिए जो नहीं करना चाहिए था ,वह किया, लेकिन अब उन पर भी गाज गिर सकती है.  बात सिर्फ इतनी ही नहीं है, सूत्र दावा कर रहे हैं कि जिले से बाहर के से लगभग 500 शिक्षक धनबाद जिले में आए थे.  लेकिन उन्हें ग्रामीण क्षेत्रों में पदस्थापित करने के बजाय शहरी क्षेत्र में पोस्टिंग दे दी गई. 

शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में बड़ी खाई पैदा होने से बढ़ी है परेशानी 
 
जिससे शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में बड़ी खाई पैदा हो गई.  एक आंकड़े के अनुसार धनबाद जिले में प्राइमरी और मिडिल स्कूल की संख्या लगभग 1700 है.  इसी तरह स्थापना अनुमति प्राप्त हाई स्कूल की संख्या लगभग 180 के आसपास है.  वैसे भी शिक्षा विभाग बाहर से देखने में तो ठीक लगता है, लेकिन विभाग के अंदर गड़बड़ियों का पुलिंदा है.  इधर, प्रदेश कांग्रेस के महासचिव  अशोक कुमार सिंह ने ग्रामीण और शहरी स्कूलों में पोस्टिंग की संख्या को लेकर बड़ा सवाल खड़ा किया है. कहा है कि वह ग्रामीण क्षेत्र से आते है.वह नगरकियारी स्कूल को गोद  भी लिए है. ट्रांसफर -पोस्टिंग में अगर गड़बड़ी हुई है ,तो इसकी कम से काम निगरानी जाँच होनी चाहिए।  जो भी अधिकारी इसके लिए दोषी हैं ,उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।  उन्होंने सवाल किया है कि शिक्षा विभाग में ट्रांसफर -पोस्टिंग को लेकर क्या कोई "चेक एंड बैलेंस" का नियम नहीं है.  अगर नहीं है तो यह गंभीर मामला है.