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Jharkhand

दीपावली विशेष : झारखंड के दो गहना बाजार झरिया की सोना पट्टी और राजधनवार का सोना बाजार आज भी क्यों है ख़ास?

Satya Bhushan Singh   Dhanbad
Satya Bhushan Singh Dhanbad
Senior Journalist

धनबाद(DHANBAD): झारखंड में गहनों के चकाचौंध  बाजार,मॉल कल्चर ,ब्रांडेड शो रूम  के बीच आज भी दो ऐसे बाजार  हैं, जहां के कारोबारी और कारीगर दशकों -दशक  पुराने विश्वास को जीवित रखे हुए है.  धनबाद जिले में झरिया की सोना पट्टी  और गिरिडीह जिले में राजधनवार के  सोना बाजार की चर्चा आज भी खूब चर्चा होती है.  धनबाद की झरिया आज भी कई विशेषताओं को अपनी आंचल में समेटे हुए है.  अभी धनतेरस - दिवाली का त्यौहार का समय है.  ऐसे में झरिया सोना पट्टी की चर्चा होनी  स्वाभाविक है.  सवाल है कि गहनों की इस चकाचौंध   दुनिया में भी झरिया सोना  पट्टी  की साख क्यों बची हुई है.  लोग आज भी क्यों भरोसा झरिया की  सोना पट्टी पर करते हैं? लोग क्यों 100 -200 किलोमीटर दूर से झरिया सोना पट्टी पहुंचते हैं? 

झरिया सोना पट्टी को कभी झरिया राजा ने बसाया था

झरिया सोना पट्टी को कभी झरिया राजा ने बसाया था.  झरिया की सोना पट्टी वह दौर भी देखी थी, जब कोलकाता से लेकर बनारस के बीच सोना चांदी की सबसे मशहूर मंडी हुआ करती थी.  लेकिन कुछ दशकों में विस्थापन, भू -धंसान , भूमिगत आग  और कोयला मजदूरों की संख्या में कमी के कारण इस बाजार पर प्रतिकूल असर पड़ा है.  बावजूद झरिया सोना पट्टी की साख आज भी अटूट है.  ग्रामीण और शहरी क्षेत्र के लोग आज भी झरिया सोना पट्टी खरीदारी को पहुंचते हैं.  धनबाद में एक से एक सोना -चांदी के बड़े-बड़े शोरूम खुल गए हैं, लेकिन आज भी लोग  झरिया सोना पट्टी  का रुख करते है.  जॉर्ज पंचम, महारानी विक्टोरिया और एडवर्ड के जमाने के सिक्कों  की झरिया सोना पट्टी में ग्राहक खूब-खोज करते हैं. 

झरिया सोना पट्टी की असली पहचान यहां के स्थानीय कारीगर हैं

 वैसे तो, झरिया अपने आप में खास है.  झरिया का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है.  एक समय में तो इसे पूर्वी भारत का सबसे बड़ा सोना -चांदी और आभूषण बाजार गिना जाता था.  आज के कारपोरेट और रेडीमेड आभूषणों के दौर में भी झरिया की सोना पट्टी  अपनी एक खास पहचान बनाये  हुए है.  सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी यहां के कारोबारियों  ने शुद्धता और विश्वसनीयता का एक ऐसा पैमाना तय किया है, जिसके कारण आज भी धनबाद ही नहीं, बाहर से भी लोग  खरीदारी करने आते हैं.  सोना पट्टी की असली पहचान यहां के स्थानीय कारीगर हैं.  समय के साथ इनकी संख्या कम हुई है, लेकिन आज भी यहां के हुनरमंद  कारीगर हाथ से बने आभूषणों के लिए जाने जाते हैं.  ग्राहक अपनी पसंद के डिजाइन के अनुसार गहने बनवाते  हैं. 

धनतेरस और दिवाली में आज भी जुटती है खरीदारों की भीड़ 
 
धनतेरस और दिवाली के मौके पर इस बाजार की रौनक देखने लायक होती है. इधर ,कई विशेषता समेटे गिरिडीह का राजधनवार का सोना बाजार पहले से कमजोर जरूर हुआ है ,लेकिन विश्वसनीयता में कोई कमी नहीं आई है.  और यही वजह है कि राज्य से बाहर के लोग भी अपने मनपसंद गहने  खरीदने अथवा बनवाने के लिए राज धनवार  पहुंचते है.  दावा किया जाता है कि राजधनवार के सोने की गारंटी होती है.  यह आभूषण बाजार दशको पुराना है.  इस बाजार में पारंपरिक बंगाली कारीगरी और बारीक नक्काशी  वाले गहनों  की विरासत आज भी जीवंत है.  यह बाजार भी आज के बाजार की डिजाइन ,हल्के गहनों  के साथ कदमताल कर रहा है.