Jharkhand

राजनीतिक संत एके राय की पुण्यतिथि :एक ऐसे भी सांसद हुए जिसकी पेंशन राशि राष्ट्रपति कोष में जाती रही

Satya Bhushan Singh Dhanbad
Senior Journalist
राजनीतिक संत एके राय की पुण्यतिथि :एक ऐसे भी सांसद हुए जिसकी पेंशन राशि राष्ट्रपति कोष में जाती रही

धनबाद(DHANBAD):  वह तो केमिकल इंजीनियर बनकर धनबाद आए थे.  सिंदरी एफसीआई में नौकरी ज्वाइन की , लेकिन नौकरी रास नहीं आई और मजदूरों पर अत्याचार ने उन्हें नौकरी छोड़ने को मजबूर कर दिया और फिर तो जीवन के अंतिम दिन तक कोयला मजदूरों के उत्थान के लिए लगे  रहे.  वह व्यक्ति थे "राजनीतिक संत" पूर्व सांसद एके  राय , एके  राय जैसा अब आगे कोई नहीं होगा, ऐसा कहा जा सकता है.  झारखंड अलग राज्य की लड़ाई में भी वह शामिल रहे.  विनोद बिहारी महतो , शिबू सोरेन के साथ काम किया, झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापकों में भी ए के राय शामिल थे. 

 शिबू सोरेन से अलग होने के बाद मार्क्सवादी समन्वय समिति नाम से राजनीतिक पार्टी बनाई और सक्रिय रहे.  आजीवन अविवाहित रहे, उनका जन्म पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश)  में 1935 में हुआ था.  जयप्रकाश आंदोलन में भी वह शामिल रहे.  वह तीन बार धनबाद से सांसद और तीन बार सिंदरी से विधायक चुने गए थे.  मार्क्सवाद और मजदूर आंदोलन पर उनके आलेख विदेश में भी प्रकाशित हुए.  हिंदी और अंग्रेजी के साथ बांग्ला पर उनका  समान रूप से कमांड था.  कहां जा सकता है कि सियासत की स्याह  दुनिया में वह बेदाग रहे.  घुटने  तक पैजामा  और कुर्ते में पूरा जीवन गुजार दिया।  उनकी खासियत थी कि सादगी और ईमानदारी से जनता के दिलों पर राज करने वाले ए के राय की प्रशंसा विरोधी भी करते थे.  उन्हें देखने के बाद कोई भरोसा नहीं कर सकता कि वह तीन बार के विधायक और तीन बार धनबाद के सांसद रह चुके हैं.  

उनके पास अपनी कोई जमीन ,सम्पति  नहीं रही.  उनके निधन तक उनका बैंक बैलेंस शून्य  रहा.  तीन बार संसद में  धनबाद का प्रतिनिधित्व करने वाले एके  राय देश के एकमात्र सांसद थे, जिन्होंने जीवन भर पेंशन नहीं ली.  लोग बताते हैं कि उनके सांसद रहते हुए लोकसभा में जब सांसदों के वेतन व पेंशन बढ़ाने का बिल आया, तो विरोध किया।  उनका कहना था कि जनता हमें सेवा के लिए चुनती  है.  ऐसे में जनता की कमाई से क्यों वेतन और पेंशन दी जाए?  उनके निधन तक उनकी पेंशन राष्ट्रपति कोष में जाती रही.  एके  राय ने बतौर केमिकल इंजीनियर कोयलांचल में आये और  पूरा जीवन दे दिया।  मजदूरों के लिए कई बड़ी लड़ाइयां लड़ी.  देश में आपातकाल लागू होने के बाद एके  राय को जेल में डाल दिया गया.  वह  1977 में जेल से ही धनबाद से निर्दलीय चुनाव लड़ा और सांसद बने.  वह 60 के दशक में इंजीनियर की नौकरी छोड़कर राजनीति में आए और फिर लगातार आगे -आगे चलते चले गए.