देवघर (DEOGHAR):आगामी 16 जुलाई को भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकलेगी. यह यात्रा हिंदू धर्म के सबसे प्राचीन और सबसे बड़े उत्सवों में से एक मानी जाती है. रथ यात्रा की भव्यता देखने के लिए ओडिशा के पुरी में इस दिन देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैnआषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की विशाल रथ यात्रा निकाली जाती है.रथ की रस्सी खींचने के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतार लगती है। हर कोई इस यात्रा में शामिल होकर स्वयं को सौभाग्यशाली मानता है.
बालानंद आश्रम का रथ और भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा पुरी मंदिर की लकड़ी से निर्मित
पुरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर में स्थापित भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाएं नीम की लकड़ी से बनाई जाती है.बालानंद आश्रम के मुख्य गुरु पुरी से उसी पवित्र लकड़ी का एक हिस्सा देवघर लेकर आए थे.इसी लकड़ी का उपयोग आश्रम के रथ और भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा के निर्माण में किया गया.बालानंद आश्रम द्वारा पहली बार वर्ष 2005 में रथ यात्रा निकाली गई थी, जो आज भी लगातार जारी है.16 जुलाई को निकलने वाली रथ यात्रा को लेकर रथ की साफ-सफाई और सजावट का कार्य शुरू हो चुका है.बालानंद आश्रम के वर्तमान मुख्य गुरु पवित्रानंद स्वामी ने बताया कि इस यात्रा में सिर्फ देवघर ही नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते है. रथ यात्रा आश्रम से निकलकर शहर के विभिन्न मार्गों से गुजरते हुए पुनः आश्रम पहुंचेगी.
आश्रम के वर्तमान मुख्य गुरु 1995 में जगन्नाथ जी की प्रतिमा निर्माण प्रक्रिया का रहे हिस्सा
बालानंद आश्रम के मुख्य गुरु पवित्रानंद स्वामी ने बताया कि पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर में समय-समय पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की नई प्रतिमाओं का निर्माण पवित्र नीम की लकड़ी से किया जाता है.उन्होंने बताया कि वर्ष 1995 में जब वे पुरी में थे, तब नई प्रतिमाओं के निर्माण की प्रक्रिया में वे न केवल साक्षी बने थे, बल्कि उस पवित्र कार्य का हिस्सा भी रहे थे.उन्होंने बताया कि उन्हें भगवान जगन्नाथ के रथ पर सवार होने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ था और भगवान का आशीर्वाद मिला.उन्होंने इसे अपने जीवन के सबसे बड़े आध्यात्मिक अनुभवों में से एक बताया.
रिपोर्ट-रितुराज सिन्हा
