Jharkhand

कोल गैसीफिकेशन प्रोजेक्ट : झारखंड -बिहार में क्यों और कैसे आ सकती है अद्यौगिक क्रांति ,पढ़िए 

Satya Bhushan Singh   Dhanbad
Satya Bhushan Singh Dhanbad
Senior Journalist

धनबाद(DHANBAD): अभी पूरे देश में कोल  गैसीफिकेशन  की बड़ी चर्चा है.  दिल्ली में अभी ब्रिक्स  सम्मेलन का आयोजन किया गया था.  इस पर कोयला गैसीकरण पर विशेष जोर दिया गया.  सम्मेलन में कोल इंडिया की इकाई ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड के कास्ता  भूमिगत कोयला गैसीकरण पायलट प्रोजेक्ट की प्रगति बताई गई.  इसे सराहना मिली।  उल्लेखनीय है कि ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड कास्ता  अंडरग्राउंड कोल गैसीफिकेशन पायलट प्रोजेक्ट भारत की पहली परियोजना है और यह झारखंड के जामताड़ा जिले के कास्ता  ब्लॉक में स्थित है.  दरअसल, यह प्रोजेक्ट कोयले को सीधे जलाने के बजाय उसे सिंथेटिक गैस (मुख्य रूप से कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोजन) में बदला  जाता है.  उसे गैस का उपयोग ईंधन, उर्वरक और रसायन बनाने में होता है.  उदाहरण के लिए मेथेनॉल, अमोनिया , हाइड्रोजन, तरल ईंधन आदि में उपयोग किया जाता है. 

जामताड़ा के पाइलट  प्रोजेक्ट की प्रगति को सराहना 

जामताड़ा के पाइलट  प्रोजेक्ट की प्रगति पर संतोष व्यक्त किया गया.  बताया गया है इस तकनीक में आयात पर निर्भरता कम करने और घरेलू कोयला संसाधनों के कुशल उपयोग को बढ़ावा देने की क्षमता है.  यह भी जानकारी दी गई है कि 2030 तक कोयला  गैसी कारण की 25 परियोजनाओं की स्थापना का लक्ष्य रखा गया है.  हालांकि कोयला  गैसी कारण संयंत्र निर्माण एक लंबी प्रक्रिया है और इसे स्थापित करने में कई साल लग सकते हैं.  हालांकि कोल इंडिया और कोयला मंत्रालय इस मिशन को गति देने और उद्योग जगत की भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से कई जगहों पर रोड शो कर चुका है.  एक आंकड़े के अनुसार 2030 तक प्रतिवर्ष 10 करोड़ टन कोयले के गैसीकरण का लक्ष्य निर्धारित है.  

देश में कोयले के भंडार की कोई कमी नहीं 

फिलहाल देश में कोयले का प्रचुर भंडार है, लेकिन कच्चा तेल, एलपीजी, प्राकृतिक गैस, मेथेनॉल आदि के लिए आयात पर निर्भरता है.  वित्तीय वर्ष 2025 में मेथेनॉल, अमोनिया, अमोनियम नाइट्रेट और अन्य उत्पादों के लिए भारत का आयात बिल 2.77 लाख करोड़ रुपए था.  जानकार बताते हैं कि 20 लाख टन प्रति वर्ष क्षमता वाले संयंत्र की स्थापना पर 600 से लेकर 2000 करोड रुपए के बीच लागत आती है.  बड़े व्यावसायिक संयंत्र के लिए लगभग 250 से 500 एकड़ भूमि की जरूरत होती है.  जानकार बताते हैं कि कोयला बहुल राज्यों के अगल-बगल के प्रदेशों में भी इसकी स्थापना हो सकती है.  बस जमीन उपलब्ध हो सके.  बिहार को भी इस परियोजना से लाभ हो सकता है. 
 
झारखंड तो पहले बिहार का अंश रहा है, ओडिशा  भी बिहार के निकट है
 
झारखंड तो पहले बिहार का अंश रहा है, ओडिशा  भी बिहार के निकट है.  बिहार तक कोयला पहुंचने  में अपेक्षाकृत कम लागत आ सकती है.  इस प्रोजेक्ट के लिए पानी की भी आवश्यकता होती है.  बिहार जल संसाधन से समृद्ध है.  यहां बाढ़ के पानी को भी संचित किया जा सकता है.  दरअसल, अब कोयला मंत्रालय की निगाह कोल्  गैसीफिकेशन प्रोजेक्ट पर टिकी हुई है.  देश में कोयले का प्रचुर भंडार है.  भूमिगत खदानों में कोयले की परत नीचे चले जाने की वजह से कोयला निकालना  संभव नहीं हो पा रहा है.  यह  खर्चीला भी पड़ रहा है.  इस प्रोजेक्ट से कोयले को सतह पर निकाले  बिना सीधे जमीन के अंदर ही गैस में बदला जा सकता है.