Jharkhand

चक्रधरपुर में खुलेआम हो रहा है स्टोन माइनिंग! वन विभाग और खनन विभाग पर उठे सवाल

Priyanka Kumari CE
Sr. Content Writer
चक्रधरपुर में खुलेआम हो रहा है स्टोन माइनिंग! वन विभाग और खनन विभाग पर उठे सवाल

चाईबासा (CHAIBASA):पश्चिमी सिंहभूम जिले के चक्रधरपुर प्रखंड अंतर्गत भारनियां क्षेत्र में खुलेआम स्टोन माइनिंग और ब्लास्टिंग का आरोप लगाया गया है.आरोप है कि इस खनन गतिविधि से जंगल, पर्यावरण और हाथियों के प्राकृतिक आवागमन मार्ग यानी हाथी कॉरिडोर को नुकसान पहुंच रहा है. इस मामले को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय सदस्य सह चक्रधरपुर भाग-1 के पूर्व जिला परिषद सदस्य रामलाल मुंडा ने उपायुक्त को पत्र सौंपकर मामले की जांच और कार्रवाई की मांग की है.उन्होंने वन विभाग, खनन विभाग और लीज धारक Vridhi construction charkdhpur की भूमिका की जांच करने की मांग की है.

 वन विभाग और खनन विभाग पर उठे सवाल

 मुंडा ने उपायुक्त को दिए गए शिकायत पत्र में कहा है कि पश्चिमी सिंहभूम जिले के चक्रधरपुर प्रखंड अंतर्गत भारनियां क्षेत्र में पिछले कई वर्षों से वन क्षेत्र में खुलेआम स्टोन माइनिंग और लगातार ब्लास्टिंग की जा रही है. यह सिर्फ अवैध खान का मामला नहीं है, बल्कि जंगल, पर्यावरण, जलस्रोत और हाथियों के प्राकृतिक आवागमन मार्ग यानी कॉरिडोर पर सीधा हमला है.उन्होंने कहा कि यदि वास्तव में वन क्षेत्र और हाथी कॉरिडोर के भीतर खनन किया जा रहा है तो यह बेहद गंभीर और चिंताजनक विषय है.हाथी कॉरिडोर कोई सामान्य जमीन नहीं होती, बल्कि यह हाथियों के प्राकृतिक आवागमन का रास्ता होता है, जिससे होकर वे एक जंगल से दूसरे जंगल तक आते-जाते है.

पढ़िये शिकायत पत्र में क्या कहा गया है

शिकायत पत्र में कहा गया है कि इन क्षेत्रों में ब्लास्टिंग, भारी मशीनों का इस्तेमाल और खनन गतिविधियां न सिर्फ पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं, बल्कि हाथियों को उनके प्राकृतिक क्षेत्र से दूर होने के लिए मजबूर करती है. जब पहाड़ों को बारूद से तोड़ा जाता है तो सिर्फ पत्थर नहीं टूटते, बल्कि जंगल की शांति भी प्रभावित होती है.इसका असर वन्यजीवों और आसपास रहने वाले ग्रामीणों के जीवन पर पड़ता है.उन्होंने कहा कि लगातार धमाकों और मशीनों की आवाज के कारण हाथी अपने रास्ते बदलने को मजबूर हो सकते हैं, जिससे मानव-हाथी संघर्ष, फसल नुकसान और कई बार जान-माल के नुकसान जैसी घटनाएं सामने आती है.

डीसी से भी पूछा गया है सवाल क्या उनको इस बारे में पता है ?

 मुंडा ने प्रशासन और वन विभाग पर सवाल उठाते हुए कहा कि क्या उन्हें जंगल के भीतर चल रहे खनन और ब्लास्टिंग की जानकारी नहीं है. क्या धमाकों की आवाज और उड़ती धूल वन विभाग तक नहीं पहुंचती? उन्होंने कहा कि यदि वन क्षेत्र में बिना जरूरी पर्यावरणीय अनुमति और नियमों के उत्खनन हो रहा है तो यह कानून का उल्लंघन है.उन्होंने कहा कि जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं होते, बल्कि वे पानी, हवा, जैव विविधता और आदिवासी ग्रामीण जीवन का आधार होते है. इसलिए जरूरत केवल कागजी जांच की नहीं, बल्कि जमीनी कार्रवाई की है.

 निष्पक्ष जांच की मांग

उन्होंने पूरे क्षेत्र की निष्पक्ष जांच कराने, हाथी कॉरिडोर और वन क्षेत्र की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करने की मांग की है.उन्होंने कहा कि जिस क्षेत्र में खनन हो रहा है, वह वन विभाग से मात्र 100 मीटर की परिधि में है.ऐसे में सवाल उठता है कि किस आधार पर वन विभाग द्वारा अनापत्ति प्रमाण पत्र दिया गया, इसकी जांच होनी चाहिए.शिकायत में वन क्षेत्र पदाधिकारी, केरा वन क्षेत्र चक्रधरपुर का भी उल्लेख किया गया है.इसमें GPS के माध्यम से जांच के बाद 340 मीटर की परिधि में स्थिति होने की बात कही गई है. शिकायतकर्ता का कहना है कि इससे स्पष्ट होता है कि वन क्षेत्र के अंदर लीज धारक को लीज दिया गया है, जो जांच का विषय है.वहीं, रामलाल मुंडा ने उपायुक्त से वन विभाग, खनन विभाग और लीज धारक के खिलाफ उचित जांच कर कार्रवाई करने की मांग की है.

रिपोर्ट-संतोष वर्मा