बोकारो(BOKARO): कहावत है कि जब सइयां भए कोतवाल तो डर काहे का, बोकारो के चास प्रखंड मुख्यालय के बाहर शनिवार को कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जिसने सड़क से गुजर रहे लोगों को सवाल पूछने पर मजबूर कर दिया. झारखंड मुक्ति मोर्चा की ओर से MMDR संशोधन के विरोध में कार्यक्रम आयोजित किया गया था. विरोध का मुद्दा अपनी जगह था, लेकिन कार्यक्रम के लिए सड़क के हिस्से में लगाया गया टेंट आम लोगों के लिए परेशानी का कारण बन गया.
JMM ने 19 सितंबर को राज्य के सभी प्रखंड मुख्यालयों पर MMDR संशोधन के खिलाफ प्रदर्शन का कार्यक्रम पहले से तय किया था. इसी कड़ी में चास में भी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता जुटे. लेकिन कार्यक्रम स्थल की व्यवस्था ऐसी रही कि सड़क से गुजरने वाले लोगों को रास्ता तलाशना पड़ा.
टेंट सड़क के हिस्से में होने के कारण एक तरफ से किसी तरह वाहन निकलते रहे, जबकि दूसरी तरफ से आने वाले लोगों को रास्ता बदलकर जाना पड़ा. यानी एक तरफ सरकार में शामिल दल के कार्यकर्ता अपने मुद्दे को लेकर आवाज उठा रहे थे, तो दूसरी तरफ आम लोग बिना किसी आंदोलन में शामिल हुए रास्ते की परेशानी झेल रहे थे.
राहगीरों ने पूछा- कार्यक्रम जरूरी है तो सड़क ही क्यों?
सड़क से गुजर रहे लोगों ने इस व्यवस्था पर नाराजगी जताई. स्थानीय मनोज कुमार और राहगीर मुनेश्वर प्रसाद का कहना था कि किसी भी राजनीतिक दल को अपनी बात रखने और कार्यक्रम करने का अधिकार है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आम लोगों के आने-जाने में परेशानी खड़ी हो.
लोगों का कहना था कि कार्यक्रम के लिए प्रशासन से अनुमति लेकर सड़क से हटकर कोई जगह चुनी जा सकती थी. इससे कार्यक्रम भी होता और आम लोगों की आवाजाही भी सामान्य रहती.
सवाल भी यही है कि विरोध प्रदर्शन जनता के मुद्दों को उठाने के लिए होता है, लेकिन अगर उसी प्रदर्शन की व्यवस्था से जनता परेशान होने लगे तो सवाल उठना स्वाभाविक है.
पुलिस बोली- अनुमति लेकर किया गया कार्यक्रम
हालांकि इस पूरे मामले में प्रशासन का पक्ष अलग है. चास के एएसपी वेदांत शंकर ने बताया कि कार्यक्रम अनुमति लेने के बाद आयोजित किया गया था. सड़क पर टेंट लगाए जाने और इससे यातायात प्रभावित होने के सवाल पर उन्होंने कहा कि प्रशासन मामले को देखेगा.
अब अनुमति किन शर्तों पर दी गई और सड़क पर यातायात सामान्य रखने के लिए क्या व्यवस्था तय की गई थी, यह प्रशासन के स्तर पर देखने का विषय है.
फिलहाल चास में हुए इस कार्यक्रम ने एक सवाल जरूर छोड़ दिया है. लोकतंत्र में विरोध और प्रदर्शन जरूरी हैं, लेकिन सड़क पर चलना भी आम आदमी की रोजमर्रा की जरूरत है. ऐसे में राजनीतिक कार्यक्रम चाहे सत्ता पक्ष का हो या विपक्ष का, व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि अपनी आवाज उठाने के चक्कर में आम लोगों का रास्ता न रुक जाए.
रिपोर्ट - संजीव कुमार