टीनपी डेस्क (TNP DESK): स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को लेकर राजनीतिक हलचल तेज है. देश के अलग अलग राज्यों में चुनाव आयोग और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर प्रदर्शन बढ़ता चला जा रहा है. ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर राज्यों में लगातार प्रदर्शन चल रहा है. ऐसे में SIR को लेकर देश की सियासत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुँच चुका है. गौरतलब है की झारखंड समेत कई राज्यों में वोटर लिस्ट के सत्यापन और नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया चल रही है. इसी दौरान फॉर्म 6 में कथित बदलाव और फॉर्म 7 के इस्तेमाल को लेकर विवाद खड़ा हुआ है. ऐसे में 5 अक्टूबर यानी सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि उसने फॉर्म 6 में किसी भी तरह के मॉडिफाइड फॉर्म को मंजूरी नहीं दी है. ऐसे में कोर्ट ने चुनाव आयोग से रिकॉर्ड भी मांगा है.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई जहां चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इस दावे पर स्थिति साफ करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी तरह के मॉडिफाइड फॉर्म 6 को मंजूरी नहीं दी है. कोर्ट ने चुनाव आयोग से रिकॉर्ड मांगा है और यह जानना चाहा है कि फॉर्म में बदलाव किसने किया. अगर जांच में यह सामने आता है कि निर्णय निर्धारित प्रक्रिया और सर्वसम्मति के बिना लिए गए थे, तो कोर्ट उन फैसलों को रद्द करने पर विचार कर सकता है.
कैसे शुरू हुआ था विवाद
सबसे बड़ा विवाद ऑनलाइन फॉर्म 6 में अतिरिक्त घोषणा जोड़े जाने को लेकर शुरू हुआ. आरोप लगाया गया कि SIR के दौरान फॉर्म 6 में ऐसी जानकारी मांगी गई जिसमें आवेदक से उसके माता-पिता या दादा-दादी के पुराने SIR रिकॉर्ड से जुड़ी जानकारी मांगी गई. विपक्षी दलों ने सवाल उठाया कि अगर फॉर्म एक नियम के तहत तय है, तो उसमें बदलाव किस अधिकार से किया गया? कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी सवाल उठाया कि ऑनलाइन फॉर्म में बदलाव के लिए TCS को निर्देश किसने दिया.
फॉर्म 6 क्या है?
SIR में अलग अलग श्रेणी के लिए अलग अलग फॉर्म निर्धारित किए है. ऐसे में फॉर्म 6 नए मतदाता के तौर पर नाम जुड़वाने के लिए इस्तेमाल होता है. पहली बार वोटर बनने वाला व्यक्ति या किसी दूसरे स्थान से शिफ्ट होकर आया व्यक्ति इस फॉर्म के जरिए मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने का आवेदन कर सकता है. फॉर्म 6 में उम्र, पता और दूसरी जरूरी जानकारी देनी होती है. इसलिए इसे नए मतदाता के लिए वोटर लिस्ट में एंट्री का प्रमुख माध्यम माना जाता है.
फॉर्म 7 किस काम आता है?
फॉर्म 7 का इस्तेमाल मतदाता सूची में दर्ज किसी नाम पर आपत्ति या नाम हटाने के लिए किया जाता है. कोई व्यक्ति अपना नाम हटाने का अनुरोध भी कर सकता है या किसी दूसरे व्यक्ति के नाम पर आपत्ति दर्ज करा सकता है. यही वजह है कि SIR के दौरान फॉर्म 7 सबसे ज्यादा चर्चा में है. विपक्षी दलों का आरोप है कि कुछ जगहों पर इसका इस्तेमाल बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाने के लिए किया जा रहा है. चुनाव आयोग की प्रक्रिया के मुताबिक किसी नाम को हटाने से पहले निर्धारित सत्यापन और प्रक्रिया का पालन किया जाना जरूरी है.
चुनाव आयोग के अंदर भी उठे सवाल
मामला तब और गंभीर हो गया जब चुनाव आयोग के भीतर ही इस बदलाव को लेकर आपत्तियां सामने आने की बात कही गई. आरोप है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस बदलाव पर कई बार आपत्ति जताई. वहीं विपक्ष का कहना है कि बिना निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के फॉर्म में बदलाव किया गया. दूसरी ओर चुनाव आयोग की ओर से पहले यह दावा किया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था को बरकरार रखा है.
फॉर्म 7 को लेकर भी आरोप
फॉर्म 6 के साथ-साथ फॉर्म 7 के कथित दुरुपयोग का मुद्दा भी विवाद का कारण बना है. कर्नाटक में मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने आरोप लगाया कि बड़े पैमाने पर प्री-प्रिंटेड फॉर्म 7 के जरिए मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश की गई. विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि इसमें अल्पसंख्यक, दलित और आदिवासी मतदाताओं को निशाना बनाया गया. तेलंगाना में भी बड़ी संख्या में फॉर्म 7 दाखिल होने को लेकर सवाल उठे. हालांकि, इन आरोपों की जांच और प्रत्येक मामले में अंतिम निर्णय निर्धारित चुनावी प्रक्रिया के तहत होना है.
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग और राज्यों में चल रही SIR प्रक्रिया के बीच है. झारखंड में भी मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान फॉर्म 6, 7 और 8 महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. सबसे बड़ा सवाल यही है कि फॉर्म 6 में अतिरिक्त घोषणा किसके निर्देश पर जोड़ी गई, उसका कानूनी आधार क्या था और इससे प्रभावित मतदाताओं को क्या राहत मिलेगी. वहीं फॉर्म 7 को लेकर उठे आरोपों में यह तय होना बाकी है कि कहीं वैध मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाने की कोशिश तो नहीं हुई.
झारखंड के साथ किन राज्यों में हो रहा SIR?
SIR की प्रक्रिया अलग-अलग चरणों में कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू की गई है. झारखंड में भी SIR की प्रक्रिया चल रही है, जहां मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान नए नाम जोड़ने, नाम हटाने और संशोधन के लिए फॉर्म 6, 7 और 8 का इस्तेमाल किया जा रहा है. बता दें, बिहार में SIR को लेकर सबसे पहले बड़ा राजनीतिक और कानूनी विवाद सामने आया था. इसके बाद यह प्रक्रिया दूसरे राज्यों तक पहुंची. पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, गोवा समेत कई राज्यों में SIR को लेकर राजनीतिक बहस और आपत्तियां सामने आई हैं. हालांकि, हर राज्य में SIR का चरण और प्रक्रिया एक जैसी नहीं है.
