टीएनपी डेस्क (TNP DESK): नई दिल्ली में इस समय दुनिया के कई बड़े नेता एक मंच पर जुटे हैं. मौका है 18वें BRICS Summit का, जिसकी मेजबानी इस बार भारत कर रहा है. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग समेत BRICS देशों के नेताओं की मौजूदगी की वजह से इस बैठक पर पूरी दुनिया की नजर है. लेकिन सवाल है कि आखिर इस सम्मेलन में ऐसा क्या हो रहा है, जो इसे इतना अहम बना रहा है?
दरअसल, दुनिया इस समय कई तरह के तनाव से गुजर रही है. रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर पश्चिम एशिया के हालात और अमेरिका-चीन के बीच खींचतान तक कई बड़े मुद्दे सामने हैं. दूसरी तरफ भारत समेत कई विकासशील देश चाहते हैं कि दुनिया के बड़े फैसलों में उनकी बात भी ज्यादा मजबूती से सुनी जाए. यही वजह है कि इस बार BRICS की बैठक सिर्फ कारोबार और अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है. इसमें दुनिया की राजनीति और आने वाले समय के पावर बैलेंस की भी बात हो रही है.
पहले दिन क्या-क्या हुआ?
सम्मेलन के पहले दिन यानी 12 सितंबर को BRICS नेताओं ने कई बड़े मुद्दों पर बातचीत की. सबसे ज्यादा चर्चा इस बात पर हुई कि दुनिया के बड़े अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में विकासशील देशों को ज्यादा जगह कैसे मिले. इसके बाद BRICS देशों के बीच New Delhi Declaration पर सहमति बनी. इसमें आतंकवाद, व्यापार, आर्थिक सहयोग, ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में सुधार जैसे मुद्दों को शामिल किया गया. यह सहमति इसलिए भी अहम है क्योंकि BRICS में शामिल सभी देशों की विदेश नीति और प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं. कई मुद्दों पर उनके बीच मतभेद भी हैं. इसके बावजूद एक साझा घोषणा पर सहमत होना अपने आप में बड़ी बात मानी जा रही है.
भारत ने कहा- दुनिया बदली है तो सिस्टम भी बदलना चाहिए
भारत ने इस बैठक में Global South की आवाज को मजबूती से उठाया. आसान भाषा में Global South का मतलब उन विकासशील और उभरते देशों से है, जिनमें एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई देश शामिल हैं. भारत का कहना है कि दुनिया काफी बदल चुकी है, लेकिन United Nations Security Council और दूसरे बड़े अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में आज भी पुरानी व्यवस्था का असर दिखाई देता है. भारत चाहता है कि विकासशील देशों को सिर्फ दूसरे देशों के बनाए नियम मानने वाला न समझा जाए. दुनिया के नियम और नीतियां तय करने में उनकी भी बड़ी भूमिका हो.
पश्चिम एशिया का मुद्दा भी रहा अहम
BRICS Summit में पश्चिम एशिया के मौजूदा तनाव पर भी बात हुई. यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वहां होने वाली किसी बड़ी हलचल का असर तेल की कीमतों से लेकर समुद्री व्यापार और दुनिया की सप्लाई चेन तक पर पड़ सकता है. BRICS देशों ने तनाव कम करने और संयम बरतने पर जोर दिया. साथ ही देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने की बात भी कही गई. BRICS के अंदर पश्चिम एशिया के कई अहम देश भी मौजूद हैं. ऐसे में इस मुद्दे पर एक साझा रुख तक पहुंचना आसान नहीं था.
आज किन मुद्दों पर होगी बात?
सम्मेलन के दूसरे दिन यानी 13 सितंबर को बातचीत का दायरा और बड़ा हो रहा है. अब BRICS के सदस्य देशों के साथ पार्टनर और आमंत्रित देशों की भागीदारी भी अहम होगी. आज फोकस इस बात पर है कि BRICS देश मिलकर भविष्य की आर्थिक चुनौतियों से कैसे निपटें. टेक्नोलॉजी और इनोवेशन में सहयोग कैसे बढ़ाया जाए, कारोबार आसान कैसे हो और विकास का फायदा ज्यादा से ज्यादा लोगों तक कैसे पहुंचे, इन मुद्दों पर चर्चा होनी है. स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन भी एजेंडे का हिस्सा हैं. किसी नई संक्रामक बीमारी या प्राकृतिक आपदा की स्थिति में सदस्य देश एक-दूसरे को समय रहते जानकारी कैसे दें, इस दिशा में भी साझा व्यवस्था बनाने पर काम हो रहा है.
क्या अमेरिका और पश्चिम के खिलाफ खड़ा हो रहा BRICS?
BRICS को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या यह अमेरिका और पश्चिमी देशों के खिलाफ नया गुट बन रहा है. रूस, चीन और ईरान जैसे देशों की मौजूदगी के कारण ऐसी चर्चा और तेज हो जाती है. लेकिन भारत BRICS को इस नजरिए से पेश नहीं करता. भारत BRICS का सदस्य होने के साथ अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों के साथ भी करीबी रिश्ते रखता है. भारत की कोशिश BRICS को पश्चिम विरोधी मंच बनाने के बजाय विकासशील देशों की मजबूत आवाज के तौर पर आगे बढ़ाने की है.
आखिर इस सम्मेलन से बदलने वाला क्या है?
इस BRICS Summit की असली कहानी सिर्फ नेताओं की मुलाकात या साझा तस्वीरों तक सीमित नहीं है. इसके पीछे दुनिया में बदलती ताकत की कहानी भी है. कई दशकों तक अमेरिका और यूरोप का दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर रहा. अब भारत, चीन, ब्राजील और दूसरे उभरते देश भी कह रहे हैं कि दुनिया के फैसलों में उनकी हिस्सेदारी बढ़नी चाहिए. यही वजह है कि दिल्ली में हो रहा BRICS Summit आने वाले ग्लोबल ऑर्डर की एक झलक भी दिखा रहा है. सम्मेलन खत्म होने के बाद असली परीक्षा शुरू होगी. देखना होगा कि दिल्ली में व्यापार, टेक्नोलॉजी, स्वास्थ्य, सुरक्षा और Global South को लेकर जिन बातों पर सहमति बनी है, उनमें से कितनी आगे जमीन पर उतरती हैं.
