TNP DESK- अब तो देश में कोयले की कीमत बाजार से तय होगी। पहले की तरह मूल्य निर्धारण में सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होगा. यह कितना लाभकारी होगा या नुकसानदेह , इसका तो पता आगे चलेगा. लेकिन जानकार इस निर्णय के प्रतिकूल प्रभाव की चर्चा करने लगे है. सबकुछ के बावजूद देश में बिजली आपूर्ति का सबसे भरोसेमंद स्रोत अभी भी कोयला ही है. वित्तीय वर्ष 2015-16 में पावर प्लांतो को 478 मिलियन टन कोयले की आपूर्ति की गई थी. यह आंकड़ा 2024- 25 में बढ़कर 870 मिलियन टन पहुंच गया है. यानी पावर प्लांट में कोयले की मांग हर साल बढ़ रही है.
वैश्विक स्तर पर कोयले के उपयोग में कमी का दबाव है
यह अलग बात है कि जलवायु परिवर्तन संबंधी मापदंडों को देखते हुए वैश्विक स्तर पर कोयले के उपयोग में कमी का दबाव है. ऐसे में कोयला अब गैसीफिकेशन के माध्यम से बदले स्वरूप में ऊर्जा स्रोत का विकल्प बनने की तैयारी कर रहा है. यानी कोयले का महत्व तब भी था और आगे भी रहेगा। इस बीच अब कोयले की कीमत बाजार तय करेगा और इसके साथ ही कोयला उद्योग में नए युग की शुरुआत होगी। सरकार तर्क दे रही है कि यह नया निर्णय देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और औद्योगिक विकास की गति को तेज करने में मददगार साबित होगा। ज्यादा पारदर्शी, प्रतिस्पर्धी और बाजार संचालित होगा। इससे कोयले के खरीदारों और विक्रेताओं दोनों को बेहतर अवसर मिलेंगे.
कोयला मंत्रालय का दावा कितना सच साबित होगा
बताया जाता है कि केंद्र सरकार ने कोल् एक्सचेंज नियम 2026 को अधिसूचित कर दिया है. कोयला मंत्रालय का दावा है कि यह कदम भारत की कोयला आपूर्ति श्रृंखला के आधुनिकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है. अब कोयल जैसे ऊर्जा के प्रमुख स्रोत को बाजार के भरोसे छोड़ देना कितना सही है अथवा गलत या तो आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन इतना तो तय है कि प्राइस फिक्सेशन पूरी तरह से बाजार आधारित होने से कोयले की कीमत में अस्थिरता बढ़ सकती है. कोयले की कीमत में उतार-चढ़ाव का सीधा असर बिजली की दर पर पड़ सकता है. घरेलू बाजार में बड़े कॉर्पोरेट घरानो का एकाधिकार हो सकता है. ऐसे में छोटे उद्योग मर सकते हैं.
