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आदिवासी महिला सविता बनी समाज में मिसाल, पति के अत्याचार से टूटी नहीं पढ़ाई कर बन गई IAS,जानिए एक काहनी

Varsha Varma CE
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आदिवासी महिला सविता बनी समाज में मिसाल, पति के अत्याचार से टूटी नहीं पढ़ाई कर बन गई IAS,जानिए एक काहनी

टीएनपी डेस्क (TNP DESK): कहते हैं कि हालात इंसान को तोड़ भी सकते हैं और गढ़ भी सकते हैं. कुछ लोग मुश्किलों के आगे घुटने टेक देते हैं, जबकि कुछ लोग उन्हीं मुश्किलों को अपनी ताकत बना लेते हैं. मध्य प्रदेश की IAS अधिकारी सविता प्रधान की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. एक समय था जब उन्हें भूख से बचने के लिए बाथरूम में छिपकर रोटियां खानी पड़ती थीं, घर में अपमान और हिंसा झेलनी पड़ती थी, लेकिन आज वही महिला हजारों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी है.

मध्य प्रदेश के एक आदिवासी परिवार में जन्मीं सविता प्रधान का बचपन बेहद साधारण परिस्थितियों में बीता. परिवार आर्थिक रूप से कमजोर था और गांव में लड़कियों की शिक्षा को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता था. इसके बावजूद सविता के भीतर पढ़ने और कुछ बड़ा करने का सपना जिंदा था. अपनी मेहनत और लगन के दम पर वह अपने गांव की पहली लड़की बनीं, जिसने दसवीं की परीक्षा पास की. यह उपलब्धि उनके परिवार के लिए गर्व का विषय थी, लेकिन उनकी जिंदगी में आगे और भी कई कठिन मोड़ आने बाकी थे.

महज 16-17 वर्ष की उम्र में उनकी शादी कर दी गई. परिवार को उम्मीद थी कि बेटी को अच्छा घर मिलेगा और वह आगे भी अपनी पढ़ाई जारी रख सकेगी. लेकिन ससुराल पहुंचने के बाद सविता के सपने धीरे-धीरे टूटने लगे. वहां उनके साथ परिवार के सदस्य की तरह नहीं, बल्कि एक नौकरानी की तरह व्यवहार किया जाता था. दिनभर काम करने के बावजूद उन्हें सम्मान तो दूर, भरपेट भोजन भी नहीं मिलता था.

स्थिति इतनी खराब थी कि कई बार उन्हें भूख मिटाने के लिए रोटियां छिपाकर बाथरूम में जाकर खानी पड़ती थीं. छोटी-छोटी बातों पर अपमान, गाली-गलौज और मारपीट उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी थी. जब उन्होंने अपनी परेशानी परिवार वालों को बताई, तो उन्हें समझाया गया कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा. लेकिन शादी के बाद दो बच्चों के जन्म के बावजूद हालात नहीं बदले.

लगातार हो रहे अत्याचार और मानसिक पीड़ा ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया. एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने अपनी जिंदगी समाप्त करने का विचार कर लिया. लेकिन उसी दौरान उनके मन में एक सवाल उठा मैं दूसरों की गलतियों की सजा खुद को क्यों दूं यही सवाल उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ. उन्होंने तय किया कि अब वह हार नहीं मानेंगी और अपने लिए नई राह बनाएंगी.

इसके बाद सविता अपने दोनों बच्चों के साथ ससुराल छोड़कर अलग हो गईं. ब्यूटी पार्लर में काम किया, तो कभी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर घर चलाया. इसी बीच उन्होंने अपनी पढ़ाई भी दोबारा शुरू की और इंदौर विश्वविद्यालय से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर्स की डिग्री हासिल की.

सविता ने बिना किसी बड़े कोचिंग संस्थान की मदद के मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) की परीक्षा पास की. इसके बाद उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा में भी सफलता हासिल कर ली. यह उपलब्धि उनके संघर्ष, आत्मविश्वास और अटूट संकल्प का परिणाम थी.

प्रशासनिक सेवा में आने के बाद उनकी पहली नियुक्ति चीफ म्यूनिसिपल ऑफिसर के रूप में हुई. अपने कार्यकाल में उन्होंने ईमानदार और सख्त अधिकारी की पहचान बनाई. बाद में जब उनके पति ने फिर से हिंसा करने की कोशिश की, तो इस बार उन्होंने चुप रहने के बजाय कानूनी रास्ता चुना. वरिष्ठ अधिकारियों और पुलिस की मदद से उन्होंने न्याय हासिल किया और बाद में तलाक लेकर नई जिंदगी की शुरुआत की.

आज सविता प्रधान मध्य प्रदेश की चर्चित IAS अधिकारियों में गिनी जाती हैं. वह ग्वालियर संभाग में जॉइंट डायरेक्टर के पद पर कार्यरत हैं और इससे पहले खंडवा नगर निगम की पहली महिला कमिश्नर भी रह चुकी हैं. सविता प्रधान की कहानी सिर्फ एक IAS बनने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस साहस की कहानी है जो हर मुश्किल के सामने डटकर खड़ा रहता है. उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो कोई भी बाधा सफलता की राह नहीं रोक सकती.