टिएनपी डेस्क(TNP DESK): 4 सितंबर 2026 की सुबह जब देश का ज्यादातर हिस्सा सो रहा था, उसी वक्त श्रीहरिकोटा में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO के वैज्ञानिक एक बेहद अहम मिशन को अंजाम दे रहे थे. सुबह 2:55 बजे सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से GSLV-F17 ने उड़ान भरी और कुछ ही देर में मिशन ने भारत को एक बड़ी अंतरिक्ष सफलता दिला दी. इसरो के मुताबिक GSLV-F17 ने EOS-05 को उसकी निर्धारित सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में सफलतापूर्वक पहुंचाया.
यह मिशन इसलिए भी खास है क्योंकि EOS-05 भारत का पहला जियोसिंक्रोनस इमेजिंग अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट है. इसका मकसद अंतरिक्ष से धरती की निगरानी करना और अलग-अलग तरह की इमेजिंग के जरिए अहम जानकारी जुटाना है.
‘नॉटी बॉय’ के लिए बड़ी परीक्षा
GSLV को कई बार अपनी पिछली उड़ानों में चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. इसी वजह से इसे मजाकिया अंदाज में ‘नॉटी बॉय’ भी कहा जाता रहा है. लेकिन GSLV-F17 की सफलता ने एक बार फिर साबित किया है कि मुश्किल मिशनों में भी इसरो अपनी तकनीक और तैयारी के दम पर वापसी कर सकता है.
इस मिशन की सफलता ऐसे समय में आई है, जब इससे पहले कुछ भारतीय लॉन्च मिशनों को असफलताओं का सामना करना पड़ा था. इसरो के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक 2021 का जीएसएलवी-एफ10 मिशन सफल नहीं हो पाया था. वहीं 2025 में पीएसएलवी-सी61 और 2026 में पीएसएलवी-सी62 मिशन भी अपने उद्देश्यों को पूरा नहीं कर सके थे.
EOS-05 से क्या फायदा होगा?
ईओएस-05 एक अत्याधुनिक अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट है. आसान भाषा में कहें तो यह अंतरिक्ष से धरती की तस्वीरें और उससे जुड़ा डेटा जुटाने का काम करेगा.
इस तरह के सैटेलाइट मौसम, पर्यावरण, जमीन और प्राकृतिक घटनाओं की निगरानी में काफी उपयोगी होते हैं. ईओएस-05 की खासियत यह है कि यह जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से इमेजिंग करने वाला भारत का पहला सैटेलाइट है. इससे एक बड़े क्षेत्र की निगरानी और अलग-अलग तरह की इमेजिंग में मदद मिल सकती है.
क्रायोजेनिक तकनीक ने बदली भारत की ताकत
GSLV की सबसे खास तकनीकों में इसकी क्रायोजेनिक अपर स्टेज भी शामिल है. भारत ने इस तकनीक को विकसित करने में लंबे समय तक मेहनत की. इसरो के मुताबिक स्वदेशी क्रायोजेनिक तकनीक ने भारत को भारी सैटेलाइट को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में पहुंचाने की क्षमता मजबूत करने में मदद की है.
यानी जिस तकनीक को हासिल करना भारत के लिए कभी बड़ी चुनौती था, आज वही तकनीक देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम की बड़ी ताकत बन चुकी है.
भारत के लिए क्यों खास है यह सफलता?
कुल मिलाकर जीएसएलवी-एफ17 और ईओएस-05 मिशन भारत के बढ़ते अंतरिक्ष सामर्थ्य की एक और मिसाल है. यह सफलता दिखाती है कि असफलताओं के बाद भी इसरो अपनी तकनीक में सुधार कर आगे बढ़ने की क्षमता रखता है.
‘नॉटी बॉय’ कहे जाने वाले जीएसएलवी-एफ17 ने इस बार अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई और ईओएस-05 को उसकी निर्धारित ऑर्बिट तक पहुंचा दिया. अंतरिक्ष में भारत की बढ़ती मौजूदगी के लिहाज से यह सफलता निश्चित तौर पर एक महत्वपूर्ण कदम है.