टीएनपी डेस्क(TNP DESK): दिल्ली में जंतर-मंतर प्रोटेस्ट से पहले राजधानी अघोषित किले में तब्दील हो गई है. पहले शहर के कई इलाकों में इंटरनेट काट दिया गया, फिर करीब 33 हजार से ज्यादा सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की गई है, जिसमें दिल्ली पुलिस के साथ अर्धसैनिक बल भी शामिल हैं. और अब प्रदर्शन का कॉल देने वाले नेताओं को दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरते ही हिरासत में लिए जाने की खबर है. 250 से ज्यादा ट्रेनें रद्द हैं, ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर प्रदर्शन शुरू होने से पहले ही दिल्ली में इतनी सख्ती क्यों की जा रही है? क्या सरकार को किसी बड़े जनआंदोलन की आशंका है या फिर यह कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उठाए गए एहतियाती कदम हैं?
प्रदर्शन से पहले ही हिरासत, इंटरनेट पर पाबंदी
10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शन से पहले दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था काफी सख्त कर दी गई. कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और SIR पर रोक लगाने की मांग को लेकर प्रदर्शन का ऐलान किया था.
इसके बाद राजधानी के कुछ हिस्सों में मोबाइल इंटरनेट सेवा पर रोक लगाई गई. पुलिस ने दिल्ली की सीमाओं, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और संवेदनशील इलाकों में निगरानी बढ़ा दी. कई जगह बैरिकेडिंग की गई और आने-जाने वाले वाहनों की जांच शुरू हुई. पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिलने का हवाला देते हुए लोगों को जुटने से रोकने के इंतजाम भी किए.
प्रदर्शन से पहले यूट्यूबर ध्रुव राठी को गुरुग्राम में हिरासत में लिया गया. वहीं, CJP से जुड़े अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रंका को भी दिल्ली एयरपोर्ट पर हिरासत में ले लिया गया. पार्टी ने पुलिस की इस कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं. हालांकि, हिरासत में लिए गए सभी लोगों के खिलाफ कार्रवाई की आधिकारिक वजह अलग-अलग मामलों में स्पष्ट होना जरूरी है.
250 से ज्यादा ट्रेनें रद्द, मेट्रो पर भी असर
प्रदर्शन का असर दिल्ली आने-जाने वाले यात्रियों पर भी पड़ा है. 10 अक्टूबर को 250 से ज्यादा ट्रेनों को रद्द किया गया. इनमें मेल और एक्सप्रेस के साथ लोकल ट्रेनें भी शामिल हैं. वहीं, दिल्ली मेट्रो के कई स्टेशनों पर एंट्री और एग्जिट बंद करने के निर्देश दिए गए. शुरुआती में 57 स्टेशनों पर पाबंदी की बात थी, जबकि बाद में 45 बंद किये गए है.
आखिर CJP क्यों मांग रही है ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा?
इस पूरे विवाद की जड़ SIR प्रक्रिया और मतदाता सूची में बदलाव को लेकर उठे सवाल हैं. SIR के तहत चुनाव आयोग मतदाता सूची की दोबारा जांच और संशोधन करता है. आयोग का कहना है कि इसका उद्देश्य सूची को सही करना और अपात्र या दोहराए गए नामों जैसी गड़बड़ियों को दूर करना है. दूसरी ओर, इस प्रक्रिया का विरोध कर रहे लोगों को आशंका है कि जांच के दौरान पात्र मतदाताओं के नाम भी सूची से हट सकते हैं.
विरोध करने वाले संगठन सवाल उठा रहे हैं कि अगर किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटता है, तो उसे अपनी पात्रता साबित करने और नाम वापस जुड़वाने का पर्याप्त मौका कैसे मिलेगा? इसी मुद्दे को लेकर कई जगह विरोध प्रदर्शन हुए हैं. CJP अब इसी विवाद को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और SIR पर रोक लगाने की मांग कर रही है.
अब सबसे बड़ा सवाल क्या है?
एक तरफ प्रदर्शनकारी मतदाता सूची की पारदर्शिता और चुनाव आयोग की जवाबदेही पर सवाल उठा रहे हैं. दूसरी तरफ पुलिस कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुरक्षा इंतजामों का हवाला दे रही है. लेकिन सवाल यह है कि शांतिपूर्ण विरोध और आम लोगों की आवाजाही, दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा?
लोकतंत्र में चुनाव जितने जरूरी हैं, उतना ही जरूरी मतदाताओं का भरोसा भी है. अगर किसी नागरिक को लगता है कि उसका नाम गलत तरीके से मतदाता सूची से हटाया गया है, तो उसकी शिकायत सुनने और उसे न्याय देने की व्यवस्था होनी चाहिए. साथ ही, किसी भी आरोप की जांच तथ्यों और सबूतों के आधार पर होनी चाहिए.
फिलहाल दिल्ली में प्रदर्शन से पहले की गई सख्ती, नेताओं की हिरासत से कई सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या सरकार डर गई हैं या उसे किसी बात कि चिंता सता रही हैं.