टीएनपी डेस्क(TNP DESK): भारत में दूध, दही और इससे बने पकवान खाना किसे पसंद नहीं है. लोग दूध और दही से बने तरह तरह के पकवान खाते है जैसे मिठाई, पनीर शेक इत्यादि .यह केवल भोजन का एक अलग हिस्सा ही नहीं, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताओं से भी गहराई से जुड़ा हुआ है. भारतीय थाली में दही या रायते का होना आम बात है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारी पारंपरिक मान्यताओं और आयुर्वेद के अनुसार, बरसात के मौसम, खासकर सावन के महीने में दही खाने की सख्त मनाही है? सावन के पावन महीने में कुछ खास खाद्य पदार्थों, जैसे दूध, दही और शहद के सेवन से परहेज करने की सलाह दी जाती है.
यह पाबंदी केवल एक अंधविश्वास या धार्मिक नियम नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबंधी कारण छिपा हुआ है. दरअसल, वर्षा ऋतु के दौरान हमारे आसपास का वातावरण पूरी तरह बदल जाता है, जिसका सीधा असर हमारी शारीरिक कार्यप्रणाली और पाचन तंत्र पर पड़ता है. यही वजह है कि इस मौसम में खान-पान को लेकर अत्यधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है, ताकि हम मौसमी बीमारियों की चपेट में आने से बच सकें.
आयुर्वेद के प्राचीन सिद्धांतों के अनुसार, बारिश के मौसम में प्रकृति में नमी और ठंडक बढ़ जाती है, जिससे मानव शरीर के भीतर मौजूद तीनों दोष यानी वात, पित्त और कफ का संतुलन बिगड़ने लगता है. इस मौसम में विशेष रूप से वात और पित्त दोष असंतुलित हो जाते हैं, जो शरीर को कई तरह की बीमारियों के प्रति संवेदनशील बना देते हैं. दही की तासीर स्वभाव से ठंडी (शीतलता प्रदान करने वाली) और पचने में भारी होती है. जब हम सावन के महीने में इसका नियमित सेवन करते हैं, तो यह शरीर की 'जठराग्नि' यानी पाचन अग्नि को मंद या कमजोर कर देती है. पाचन तंत्र धीमा होने के कारण पेट में गैस, अपच, भारीपन और सूजन (ब्लोटिंग) जैसी समस्याएं पैदा होने लगती हैं. इसके अलावा, इस मौसम में वायुमंडल में अत्यधिक आर्द्रता (ह्यूमिडिटी) के कारण हानिकारक बैक्टीरिया और फंगस का प्रकोप बहुत तेजी से बढ़ता है. दही को जमाने के लिए भी बैक्टीरिया की आवश्यकता होती है, और इस मौसम में बाहरी बैक्टीरिया के संपर्क में आने से दही बहुत जल्दी दूषित या अत्यधिक खट्टा हो सकता है, जो आंतों की सेहत को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है. यही कारण है कि सावन में दही से बनने वाली चीजें जैसे कढ़ी, रायता या छाछ खाने से भी बचने की सलाह दी जाती है.
बरसात के मौसम में दही का अत्यधिक सेवन हमारे श्वसन तंत्र और रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) को भी बुरी तरह प्रभावित करता है. दही के ठंडे और कफ वर्धक गुणों के कारण यह शरीर में बलगम यानी म्यूकस के निर्माण को बढ़ा देता है. इसके परिणामस्वरूप, व्यक्ति को सर्दी, खांसी, गले में खराश, साइनस और नाक बंद होने जैसी सांस से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ता है. पहले से ही एलर्जी या अस्थमा से पीड़ित मरीजों के लिए इस मौसम में दही जहर के समान काम कर सकता है. आयुर्वेद मानता है कि जब शरीर में कफ और बलगम की मात्रा बढ़ती है, तो आंतों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है, जिससे हमारा शरीर मौसमी फ्लू, वायरल इन्फेक्शन और अन्य संक्रमणों से लड़ने में सक्षम नहीं रह पाता. हालांकि, अगर आप दही के शौकीन हैं और इसे पूरी तरह छोड़ नहीं सकते, तो बारिश में इसे खाने का एक सही तरीका भी बताया गया है.
दही का सेवन कैसे करें
- दही को हमेशा दोपहर के समय खाएं जब सूर्य की रोशनी तेज होती है और शरीर की पाचन अग्नि सबसे मजबूत स्थिति में होती है. रात के समय भूलकर भी दही न खाएं.
- सादे दही की जगह उसमें हमेशा एक चुटकी भुना हुआ जीरा पाउडर, काली मिर्च, काला नमक या शहद मिलाकर खाएं. ये गर्म मसाले दही के ठंडे गुण को संतुलित करते हैं और इसे पचाने में मददगार साबित होते हैं.
