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Coal India का भी अजीब है गणित, राष्ट्रीयकरण के पचास साल में घटे कर्मी लेकिन रॉकेट के रफ़्तार से कैसे बढ़ा प्रोडक्शन 

Satya Bhushan Singh Dhanbad
Senior Journalist
Coal India का भी अजीब है गणित, राष्ट्रीयकरण के पचास साल में घटे कर्मी लेकिन रॉकेट के रफ़्तार से कैसे बढ़ा प्रोडक्शन 

धनबाद (DHANBAD): कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण के 50 साल से भी अधिक हो गए हैं. आज भी कोयला उद्योग देश की ऊर्जा का मुख्य स्रोत बना हुआ है. इसका गणित भी कुछ अजीब है. कर्मियों की संख्या घटती गई और उत्पादन का ग्राफ बढ़ता गया. यह बात सच है कि कंपनी कोयला प्रोडक्शन और व्यवसाय में तकनीक का उपयोग कर ऊंचाई पर पहुंची और और अभी भी आगे बढ़ रही है. वही स्थाई श्रमिकों की संख्या लगातार घटती गई है. आउटसोर्स कंपनियों का प्रभाव बढ़ता गया. कभी इस कंपनी में 7.80 लाख से भी अधिक कर्मी थे, जो आज केवल 2.14 लाख रह गए हैं. दूसरी ओर उत्पादन 79 मिलियन टन  से बढ़कर 768.19 मिलियन टन तक पहुंच गया है. 

2030 तक एक बिलियन टन का लक्ष्य है निर्धारित

2030 तक तो एक बिलियन टन करने का लक्ष्य है. यह बात भी सच है कि खदानों में मशीनीकरण, आधुनिक तकनीक और स्वचालित परिवहन व्यवस्था ने उत्पादन को नई ऊंचाई दी है. लेकिन रोजगार का दायरा इसके साथ उतनी ही तेजी से घटता गया और अभी भी घट रहा है. जानकारी के अनुसार नवंबर 1975 में कोल इंडिया लिमिटेड की स्थापना हुई थी. उस समय कोयला खदानों में लगभग 7.80 लाख कर्मी कार्यरत थे. उस समय कंपनी का वार्षिक उत्पादन लक्ष्य केवल 79 मिलियन टन था. वित्तीय वर्ष 25-26 में उत्पादन बढ़कर 768.19 मिलियन टन हो गया है. यानी कंपनी लगभग 10 गुना उत्पादन वृद्धि दर्ज की है. कोयले की आपूर्ति और रेलवे रैक लोडिंग में भी कीर्तिमान स्थापित हुआ है.  

राष्ट्रीयकरण के समय कोयला उद्योग रोजगार का सबसे बड़ा केंद्र था

कोयला उद्योग के जानकार बताते हैं कि राष्ट्रीयकरण के समय कोयला उद्योग रोजगार का सबसे बड़ा केंद्र हुआ करता था. श्रमिक सीधे और परोक्ष रूप से उद्योग से जुड़े थे. समय के साथ नियुक्तियों में कमी, स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना और बढ़ती तकनीक से श्रम शक्ति लगातार घटती गई. आज की स्थिति में कोल इंडिया में केवल 2.14 लाख कर्मचारी ही कार्यरत हैं. पहले जहां एक खदान में हजारों मजदूर कार्यरत थे, वहीं अब कुछ मशीन उनका काम कर रही हैं. जानकारी के अनुसार कोल इंडिया देश के आठ राज्यों में काम कर रही है. एक आंकड़े के मुताबिक फिलहाल कंपनी के पास 121 भूमिगत, 163 पोखरिया और 11 मिश्रित खदानें हैं. आज भी कोयला ऊर्जा का प्रमुख साधन बना हुआ है.  

अब कोल् इंडिया केवल कोयला उत्पादन पर निर्भर नहीं रहना चाहती

अब कंपनी तो सिर्फ कोयला उत्पादन तक ही सीमित  रहना नहीं चाहती. वह अपना दायरा बढ़ा रही है. अक्षय ऊर्जा, कोल् गैसीफिकेशन, उर्वरक और स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में बड़े निवेश की रणनीति बनाई गई है. कई पावर प्लेयर्स भी प्रवेश किए हैं. कंपनी ने वर्ष 2030 तक एक बिलियन टन कोयला उत्पादन का लक्ष्य तय किया है. इसके लिए खनन क्षेत्र में विस्तार, रेलवे नेटवर्क, फर्स्ट माइल कनेक्टिविटी पर तेजी से काम हो रहे है. यह बात सच है कि कोल इंडिया उत्पादित कोयले का पहाड़ ऊंचा होता जा रहा है लेकिन कर्मचारियों की संख्या भी उतनी ही तेजी से घट रही है.  

कोयला आधारित कई उद्योगों पर लटके हुए हैं ताले 

अगर कोयलांचल की बात की जाए तो कोयल पर आधारित उद्योगों की संख्या लगातार घट रही है. जहां कोयल पर आधारित उद्योगों से लाखों-लाख मजदूर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए थे, आज उन उद्योगों में ताले लटके हुए हैं. उद्योग मालिक भी भारी पूंजी निवेश कर फंसे हुए हैं. वैसे फिलहाल कोल इंडिया को प्राइवेट मालिकों से लगातार चुनौती मिल रही है. कोल इंडिया मैनेजमेंट इसके लिए चिंतित भी है और परेशान भी है. लगातार बदलाव किए जा रहे है. जानकार बताते हैं कि कोल इंडिया में जब से आउटसोर्स कंपनी का प्रवेश शुरू हुआ, उत्पादन का ग्राफ बढ़ता गया लेकिन जिन जगहों पर ओपन कास्ट प्रोजेक्ट चल रहे हैं, वहां की हालत भी उसी रफ्तार में बिगड़ रही है. धनबाद का झरिया शहर इसका उदाहरण हो सकता है. बाघमारा, कतरास का भी वही हाल है. निरसा भी सुरक्षित नहीं है.