टीएनपी डेस्क (TNP DESK): झारखंड की मिट्टी, जंगल, नदी और यहां की पुरानी लोककथाओं से निकली एक छोटी सी कहानी आज राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी है. बात हो रही है संताली शॉर्ट फिल्म 'आंगेन' की. पूर्वी सिंहभूम के जादूगोड़ा इलाके से आने वाले युवा डायरेक्टर रवि राज मुर्मू की इस फिल्म को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में गैर-फीचर फिल्म श्रेणी में 'बेस्ट डेब्यू फिल्म ऑफ ए डायरेक्टर' का पुरस्कार मिला है. खास बात यह है कि नॉन-फीचर फिल्म श्रेणी में पहली बार किसी संताली फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है.
लेकिन आखिर महज 12 मिनट की इस फिल्म में ऐसा क्या है, जिसने इसे राष्ट्रीय मंच तक पहुंचा दिया? इसकी कहानी जितनी साधारण तरीके से शुरू होती है, आगे बढ़ते-बढ़ते उतनी ही रहस्यमयी होती जाती है.
एक चरवाहे और उसकी बांसुरी से शुरू होती है कहानी
'आंगेन' की कहानी संताली समाज की लोककथाओं से प्रेरित है. फिल्म का मुख्य किरदार सुक्कू नाम का एक चरवाहा है. वह गांव, जंगल और प्रकृति के बीच अपनी सामान्य जिंदगी जीता है और बांसुरी बजाता है.
सुक्कू की बांसुरी की आवाज कहानी को एक दूसरी ही दुनिया में ले जाती है. उसकी बांसुरी की धुन से सात रहस्यमयी बहनें आकर्षित होती हैं. इन्हें आत्माओं और देवियों की दुनिया से जुड़ा दिखाया गया है. ये सातों बहनें खेत, तालाब और गांव के आसपास की प्राकृतिक दुनिया से जुड़ी हुई हैं.
सुक्कू पहुंच जाता है दूसरी दुनिया में
कहानी में बड़ा मोड़ तब आता है जब ये रहस्यमयी बहनें सुक्कू को अपने साथ ले जाती हैं. यहां पानी एक रास्ते की तरह काम करता है और सुक्कू अपनी जानी-पहचानी दुनिया से निकलकर एक दूसरी दुनिया में पहुंच जाता है.
लेकिन असली परेशानी तब शुरू होती है, जब सुक्कू वापस अपने घर और अपनी दुनिया में लौटना चाहता है.
उसे वापसी का कोई सीधा रास्ता दिखाई नहीं देता. उसके सामने सिर्फ तालाब और पानी के रास्ते हैं. वह एक तालाब में डुबकी लगाता है और किसी दूसरे तालाब से बाहर निकलता है. इस तरह उसकी वापसी की कोशिश एक रहस्यमयी सफर में बदल जाती है.
सिर्फ लोककथा नहीं, कहानी में छिपा है बड़ा संदेश
ऊपर से देखने पर 'आंगेन' किसी पुरानी लोककथा या रहस्यमयी कहानी जैसी लग सकती है, लेकिन निर्देशक ने इसके अंदर आज के समय से जुड़ा एक संदेश भी रखने की कोशिश की है.
रवि राज मुर्मू के मुताबिक फिल्म में दिखाई गई देवियों को प्रतीकात्मक रूप से 'विकास' से जोड़कर भी देखा जा सकता है. उनकी सोच यह सवाल उठाती है कि अगर इंसान बिना सोचे-समझे विकास के पीछे भागता चला जाए तो क्या वह ऐसी जगह पहुंच सकता है, जहां से अपनी पुरानी दुनिया में लौटना मुश्किल हो जाए?
फिल्म प्रकृति और आदिवासी समाज के पुराने रिश्ते की तरफ भी ध्यान खींचती है. जंगल, तालाब और पानी सिर्फ कहानी की खूबसूरती बढ़ाने के लिए नहीं हैं, बल्कि कहानी के अहम किरदार की तरह सामने आते हैं.
फिल्म में पानी का भी खास मतलब
'आंगेन' में पानी को दो अलग-अलग दुनियाओं के बीच रास्ते के रूप में दिखाया गया है. सुक्कू एक तालाब से दूसरे तालाब के बीच भटकता है. निर्देशक के मुताबिक पानी को कहानी में जानबूझकर एक अहम प्रतीक बनाया गया है.
फिल्म का अंत भी पूरी तरह बंद नहीं किया गया है. कहानी दर्शकों के मन में कई सवाल छोड़ती है और उन्हें अपने तरीके से इसका मतलब समझने का मौका देती है.
जमशेदपुर के ग्रामीण इलाकों में हुई शूटिंग
इस फिल्म की लंबाई करीब 12 मिनट है और इसकी शूटिंग जमशेदपुर के आसपास के ग्रामीण और प्राकृतिक इलाकों में की गई. इसमें स्थानीय कलाकारों को जगह दी गई. फिल्म से रामचंद्र मार्डी, सलोनी मुर्मू और जीतराय हांसदा जैसे स्थानीय कलाकार जुड़े रहे.
रवि राज मुर्मू ने 2024 में करीम सिटी कॉलेज के अपने छात्रों के साथ फिल्म निर्माण की बारीकियों पर काम करते हुए इसे बनाया था. सीमित संसाधनों में तैयार हुई यही छोटी सी फिल्म बाद में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार तक पहुंच गई.
'आंगेन' की खासियत यही है कि यह किसी बड़े सेट या चमक-दमक के सहारे अपनी बात नहीं कहती. एक चरवाहा, उसकी बांसुरी, सात रहस्यमयी बहनें, जंगल और पानी के जरिए फिल्म संथाली समाज की लोककथा को पर्दे पर उतारती है और साथ ही प्रकृति, विकास और अपनी जड़ों से जुड़े रहने जैसे सवाल भी छोड़ जाती है.