टिएनपी डेस्क (TNP DESK): एक दौर था जब किसी नई बॉलीवुड फिल्म को देखने के लिए शुक्रवार का इंतजार होता था. सिनेमाघरों के बाहर लंबी लाइनें लगती थीं और फिल्म हिट है या फ्लॉप, इसका फैसला काफी हद तक बॉक्स ऑफिस कलेक्शन से होता था. लेकिन स्मार्टफोन, इंटरनेट और OTT प्लेटफॉर्म के बढ़ते इस्तेमाल ने फिल्मों और दर्शकों के बीच का रिश्ता बदल दिया है. अब मनोरंजन के लिए थिएटर ही एकमात्र रास्ता नहीं है. फिल्में और वेब सीरीज मोबाइल, टीवी और लैपटॉप पर कभी भी देखी जा सकती हैं.
OTT यानी Over-The-Top प्लेटफॉर्म ने सिर्फ फिल्म देखने का तरीका नहीं बदला, बल्कि बॉलीवुड में कहानी, कलाकार, कमाई और फिल्म रिलीज करने के तरीके तक पर असर डाला है.
कोरोना के दौरान तेजी से बढ़ा OTT
भारत में OTT कोरोना महामारी से पहले ही मौजूद था, लेकिन 2020 के लॉकडाउन ने इसकी रफ्तार कई गुना बढ़ा दी. सिनेमाघर बंद हुए तो दर्शकों के पास घर बैठे मनोरंजन के लिए OTT बड़ा विकल्प बन गया.
इस दौरान कई फिल्में थिएटर का इंतजार करने के बजाय सीधे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुईं. दर्शकों को भी घर बैठे नई फिल्म देखने की आदत पड़ने लगी.
सिनेमाघर खुलने के बाद भी यह आदत पूरी तरह खत्म नहीं हुई. अब दर्शक अक्सर तय करते हैं कि कौन सी फिल्म बड़े पर्दे पर देखनी है और किसके OTT पर आने का इंतजार करना है.
स्टार से ज्यादा कहानी पर फोकस
OTT ने बॉलीवुड के पुराने स्टार सिस्टम को भी बदल दिया. थिएटर में किसी बड़े स्टार का नाम फिल्म की ओपनिंग के लिए अहम माना जाता था. डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कहानी और कंटेंट की अहमियत ज्यादा बढ़ी.
इस बदलाव का फायदा ऐसे कलाकारों को मिला, जिन्हें फिल्मों में अक्सर छोटे किरदार मिलते थे. पंकज त्रिपाठी, जयदीप अहलावत, शेफाली शाह, प्रतीक गांधी और मनोज बाजपेयी जैसे कलाकार डिजिटल कंटेंट के जरिए घर-घर तक पहुंचे.
अब दर्शक केवल हीरो या हीरोइन का नाम देखकर कंटेंट नहीं चुनते. कहानी मजबूत हो तो कम चर्चित कलाकारों वाली सीरीज और फिल्म भी बड़ी हिट बन सकती है.
फिल्मों के साथ वेब सीरीज का नया बाजार
OTT का सबसे बड़ा बदलाव वेब सीरीज के रूप में देखने को मिला. थिएटर की फिल्म को आमतौर पर दो से तीन घंटे में कहानी पूरी करनी होती है. वेब सीरीज में कहानी को कई एपिसोड और सीजन में विस्तार से दिखाया जा सकता है.
'पंचायत', 'मिर्जापुर', 'पाताल लोक', 'द फैमिली मैन' और 'स्कैम 1992' जैसी सीरीज ने दिखाया कि दर्शक अलग तरह की कहानियां देखने के लिए तैयार हैं.
हिंदी सिनेमा की सीमा भी टूटी
OTT ने भाषा की दीवार भी काफी हद तक कमजोर की है. पहले हिंदी दर्शकों तक दक्षिण भारतीय या विदेशी फिल्में सीमित तरीके से पहुंचती थीं. अब डबिंग और सबटाइटल की मदद से मलयालम, तमिल, तेलुगु, कोरियन और दूसरी भाषाओं का कंटेंट आसानी से देखा जा रहा है.
इसका असर बॉलीवुड पर भी पड़ा. दर्शकों के पास विकल्प बढ़े तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री पर बेहतर कहानी और प्रोडक्शन देने का दबाव बढ़ा.
दर्शक के हाथ में आया कंट्रोल
OTT की असली ताकत दर्शक को मिला कंट्रोल है. अब तय समय पर टीवी के सामने बैठने या हर फिल्म के लिए थिएटर जाने की मजबूरी नहीं है. दर्शक अपनी पसंद के समय कंटेंट देख सकता है, रोक सकता है और बाद में वहीं से शुरू कर सकता है.
यही बदलाव बॉलीवुड की पूरी तस्वीर बदल रहा है. थिएटर अब भी फिल्मी दुनिया का बड़ा हिस्सा है, लेकिन मोबाइल स्क्रीन भी उतनी ही अहम हो चुकी है. आने वाले समय में बॉलीवुड की सफलता शायद इसी बात पर निर्भर करेगी कि वह बड़े पर्दे के रोमांच और छोटी स्क्रीन की सुविधा के बीच कितना बेहतर संतुलन बना पाता है.