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Coaching Institute के माया जाल में फंस रहे छात्र, बड़े-बड़े बैनर और स्कॉलरशिप का लालच देकर वसूली जा रही मोटी फीस

Shreya Upadhyay  CE
Shreya Upadhyay CE
Content Writer & Copy Editor

टीएनपी डेस्क (TNP DESK): आज के दौर में किसी भी कोर्स की पढ़ाई से पहले ख्याल आता है कोचिंग संस्थान का, जहां बच्चों का दाखिला होगा. यहां तक की इन दिनों इस बात से ज्यादा फरक नहीं पड़ता कि आप किस स्कूल में पढ़ते हैं, पर इस बात पर खासा ध्यान दिया जाता है कि आप किस कोचिंग संस्थान में पढ़ रहे हैं. पर अच्छे कोचिंग संस्थान में पढ़ने की रेस में लोग एक ऐसे माया जाल में फँसते जा रहे हैं, जिसकी शायद उन्हें भयानक तक नहीं है. 

दरअसल प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता हासिल करने और अच्छे संस्थान में दाखिला पाने की चाहत में अभिभाव अपनी मेहनत की कमाई बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करते हैं. लेकिन आज के दौर में कई कोचिंग संस्थानों की चमक-दमक और लुभावने दावों के बीच छात्रों और अभिभावकों के लिए सही संस्थान का चुनाव करना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है. बड़े-बड़े बैनर, आकर्षक फ्लेक्स, टॉपर्स की तस्वीरें और स्कॉलरशिप के वादे करके विद्यार्थियों को अपनी ओर खींचा जाता है और यहीं से शुरू होता है मायाजाल में फँसने का खेल. इसके बाद कई बार उनसे मोटी फीस वसूल ली जाती है. ऐसे में सवाल उठता है कि शिक्षा के नाम पर चल रहे इस प्रचार के पीछे कितनी सच्चाई है.

शहरों की प्रमुख सड़कों, चौक-चौराहों और बाजारों में कोचिंग संस्थानों के बड़े-बड़े होर्डिंग और फ्लेक्स आसानी से देखने को मिल जाते हैं. इन पर शानदार रिजल्ट, शत-प्रतिशत सफलता, बेहतर रैंक और टॉपर्स की तस्वीरें प्रमुखता से लगाई जाती हैं. इन विज्ञापनों को देखकर छात्र और उनके माता-पिता प्रभावित हो जाते हैं. उन्हें लगता है कि संस्थान में दाखिला लेने से उनके बच्चे का भविष्य सुरक्षित हो जाएगा. यहां तक कि कई संस्थान अपनी उपलब्धियों का प्रचार इस तरह करते हैं कि अभिभावकों को लगता है कि सफलता की गारंटी मिल रही है. हालांकि, किसी संस्थान के विज्ञापन में किए गए दावों और उसकी वास्तविक शैक्षणिक गुणवत्ता के बीच अंतर हो सकता है. इसलिए केवल बैनर, फ्लेक्स या प्रचार देखकर दाखिला लेना छात्रों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है.

छात्रों को आकर्षित करने के लिए स्कॉलरशिप टेस्ट, विशेष छूट और सीमित सीटों जैसे प्रस्ताव भी सामने रखे जाते हैं. शुरुआत में अभिभावकों को कम फीस में बेहतर शिक्षा मिलने की उम्मीद दिखाई जाती है. कई बार स्कॉलरशिप मिलने की बात कहकर छात्रों को दाखिले के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. लेकिन दाखिले के समय वास्तविक फीस, अतिरिक्त शुल्क, अध्ययन सामग्री और अन्य खर्चों की जानकारी स्पष्ट नहीं होने से अभिभावकों का बजट बिगड़ सकता है.

ऐसे में जरूरी है कि छात्र और उनके माता-पिता स्कॉलरशिप की शर्तों को अच्छी तरह समझें. कितनी छूट मिलेगी, वह कितने समय तक लागू रहेगी और किन परिस्थितियों में उसे वापस लिया जा सकता है, इसकी जानकारी लिखित रूप में लेनी चाहिए. बिना पूरी जानकारी के जल्दबाजी में फीस जमा करना आर्थिक परेशानी का कारण बन सकता है.

एक ही टॉपर की तस्वीर कई संस्थानों के बैनर पर
कोचिंग संस्थानों के प्रचार में टॉपर्स की तस्वीरों का इस्तेमाल भी चर्चा का विषय है. कई बार एक ही सफल छात्र की तस्वीर अलग-अलग संस्थानों के बैनर या विज्ञापनों में दिखाई देने का दावा सामने आता है. इससे विद्यार्थियों और अभिभावकों के मन में सवाल उठते हैं कि आखिर उस छात्र ने वास्तव में किस संस्थान से पढ़ाई की थी और उसकी सफलता में किस संस्थान की कितनी भूमिका रही. सिर्फ किसी टॉपर की तस्वीर देखकर यह मान लेना उचित नहीं है कि संबंधित संस्थान में दाखिला लेने से वैसी ही सफलता मिलेगी. अभिभावकों को संस्थान से परिणामों का प्रमाण, छात्र की वास्तविक उपलब्धि और उसके साथ संस्थान के संबंध की जानकारी मांगनी चाहिए. सफलता का श्रेय किसे दिया जा रहा है, इसकी पुष्टि करना भी जरूरी है.