Bihar

बांकीपुर से चुनाव लड़ना सभी का अधिकार, एनडीए बड़े अंतर से जीतेगी: संजय झा

Rajnish Sinha
Sr. Copy Editor
बांकीपुर से चुनाव लड़ना सभी का अधिकार, एनडीए बड़े अंतर से जीतेगी: संजय झा

पटना (PATNA) : जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने कहा कि लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति को किसी भी सीट से चुनाव लड़ने का अधिकार है. बांकीपुर विधानसभा सीट से प्रशांत किशोर के चुनाव लड़ने के सवाल पर उन्होंने कहा कि जनता ही अंतिम मालिक होती है और वही अपना फैसला सुनाती है. उन्होंने कहा कि बांकीपुर का चुनाव पूरे बिहार के लिए प्रतिष्ठा का विषय बन गया है.

एनडीए बहुत बड़े अंतर से जीत दर्ज करेगी

संजय झा ने कहा कि उन्हें लगातार फीडबैक मिल रहा है कि बांकीपुर सीट पर एनडीए बहुत बड़े अंतर से जीत दर्ज करेगी. उन्होंने भाजपा नेता नितिन नवीन का जिक्र करते हुए कहा कि वह ऐसे पहले व्यक्ति हैं जिनकी पार्टी की सरकार दिल्ली में है और जो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं. उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि वहां नेतृत्व एक ही परिवार तक सीमित रहता है जबकि भाजपा में कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ने का अवसर मिलता है.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लेकर संजय झा ने कहा कि बिहार में एनडीए के सर्वमान्य नेता नीतीश कुमार हैं और वर्ष 2025 के बाद भी वही मुख्यमंत्री बनेंगे. उन्होंने कहा कि पिछले 20 वर्षों में अधिकतर समय बिहार में एनडीए की सरकार रही है और नीतीश कुमार के नेतृत्व में राज्य ने विकास की नई पहचान बनाई है. उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार किसी दबाव में काम करने वाले नेता नहीं हैं. सरकार उनके मार्गदर्शन और सक्रिय सहभागिता से चल रही है तथा उन्हें कोई भी दबाव में नहीं ला सकता.

राज्य के विकास के लिए काम कर रहे हैं

उन्होंने कहा कि बिहार में सरकार चलाने की जितनी जिम्मेदारी भाजपा की है, उतनी ही जदयू की भी है. दोनों दल मिलकर राज्य के विकास के लिए काम कर रहे हैं.

तेजस्वी यादव के उस बयान पर, जिसमें उन्होंने बिहार का खजाना खाली होने की बात कही थी, संजय झा ने तीखी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा कि अपने ही राज्य को बदनाम करना उचित नहीं है. बिहार के खजाने में किसी तरह की कमी नहीं है और राज्य में विकास कार्य तेजी से जारी हैं. उन्होंने कहा कि बिहार में पैसों की कोई किल्लत नहीं है. साथ ही तंज कसते हुए कहा कि तेजस्वी यादव को शायद अपना वह समय याद आ रहा होगा, जब उनके शासनकाल में कर्मचारियों को छह-छह महीने तक वेतन नहीं मिलता था.