TNP DESK- बिहार में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव एक बार फिर हमलावर हो गए हैं. उन्होंने कहा है कि सिक्योरिटी ले लो, बंगला ले लो, लेकिन असल मुद्दों से वह बिहार के युवाओं को मुख्यमंत्री भटका नहीं पाएंगे. उन्होंने कहा है कि मुख्यमंत्री को लगता है कि लालू परिवार से सुरक्षा और बंगला छीनकर लोगों का ध्यान भटकाया जा सकता है, लेकिन उन्हें यह पता होना चाहिए कि युवा और बेरोजगार अगर सड़क पर उतर गए तो फिर उन्हें रोक पाना मुश्किल हो जाएगा. मुख्यमंत्री को लगता है कि राबड़ी देवी का आवास छीन लेंगे, लालू परिवार की सुरक्षा ले लेंगे तो असल मुद्दों से लोगों का ध्यान भटक जाएगा. लेकिन उनको यह पता होना चाहिए कि ऐसी बातें सिर्फ दो-चार दिन के लिए समाचार बन सकती हैं. इसको आगे कर जनहित के मुद्दों को दबाया नहीं जा सकता है.
बेरोजगार जब सड़क पर उतरते हैं तो उन्हें लाठी से पीटा जाता
बेरोजगार जब सड़क पर उतरते हैं तो उन्हें लाठी से पीटा जाता है. उनकी आवाज दबा दी जाती है. उन्होंने चुनाव के पहले किए गए वादे को याद दिलाते हुए पूछा है कि महिलाओं के ₹200000 कब मिलेंगे? अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं, स्कूलों में शिक्षक नहीं है और गरीब मरीज दर-दर भटक रहे है. उन्होंने कहा है कि आपदा के समय काम आने वाला इमरजेंसी फंड भी सुरक्षित नहीं है और उससे भी निकासी हो रही है. उन्होंने कहा है कि हम सभी के लिए अत्यंत चिंता का विषय है कि एनडीए की दिवालिया राजनीति और दिवालिए नेतृत्व के कारण प्रदेश की बिगड़ चुकी वित्तीय स्थिति, घटता राजस्व, बढ़ता राजकोषीय घाटा, अत्यधिक कर्ज, भारी ब्याज अदायगी तथा खोखली व अदूरदर्शी नीतियों के कारण हमारा बिहार कंगाल होने के कगार पर है.
खज़ाना खाली होने के कारण प्रदेश में अराजकत वित्तीय हालात है
खज़ाना खाली होने के कारण प्रदेश में अराजकत वित्तीय हालात है. नौसिखिए मुख्यमंत्री के नेतृत्व में सरकार का बजटीय प्रबंधन इतना बुरा, वित्तीय स्थिति इतनी बदतर और परिस्थितियां इतनी भयावह है कि वित्तीय वर्ष 𝟐𝟎𝟐𝟔-𝟐𝟕 के मात्र तीन महीने ही बीते है और सामान्य मासिक पेंशन दिए जाने वाले जैसे रूटीन भुगतान और कार्यों के लिए भी आकस्मिक निधि (𝐂𝐨𝐧𝐭𝐢𝐧𝐠𝐞𝐧𝐜𝐲 𝐅𝐮𝐧𝐝) से 𝟑𝟔𝟔𝟐 करोड़ रुपए की निकासी करनी पड़ रही है. सरकार को वित्तीय संकट की सच्चाई स्वीकार कर, आम जनता को गुमराह करने के बदले राज्यवासियों को स्पष्टता से बताना चाहिए कि आखिर ऐसी नौबत क्यों आई कि रूटीन भुगतान के लिए नियमित बजटीय व्यवस्था की बजाय आकस्मिकता निधि का सहारा लेना पड़ रहा है ?
