दरभंगा (DARBHANGA): अलीनगर प्रखंड में एक सरकारी स्कूल की ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसे देखकर व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है. किरतपुर प्राथमिक विद्यालय में भवन का एक पिलर टूट गया तो उसकी जगह पक्का पिलर बनाने के बजाय बेंच-डेस्क और ईंटों का सहारा दे दिया गया. यानी जिस बेंच पर बच्चों को बैठकर पढ़ना चाहिए, उसी का इस्तेमाल अब छत को संभालने के लिए किया जा रहा है. इसी जुगाड़ के नीचे स्कूल के बच्चे पढ़ते हैं, गुजरते हैं और कई बार बैठकर खाना भी खाते हैं.
जर्जर भवन में पढ़ाई को मजबूर बच्चे
स्कूल की परेशानी सिर्फ टूटे हुए पिलर तक नहीं है. भवन की छत से बारिश में पानी टपकता है. जगह-जगह प्लास्टर उखड़ चुका है और कई हिस्सों में बीम-पिलर की हालत खराब हो गई है. कुछ जगहों पर सरिया तक बाहर दिखाई देने लगा है. ऐसे माहौल में बच्चों को पढ़ाना शिक्षकों के लिए भी आसान नहीं है.
किरतपुर प्राथमिक विद्यालय में पहली से पांचवीं तक की पढ़ाई होती है और यहां करीब 191 बच्चे नामांकित हैं. लेकिन बच्चों की संख्या के हिसाब से स्कूल में कमरे नहीं हैं. नियमानुसार कम से कम छह कमरों की जरूरत है, जबकि फिलहाल सिर्फ दो कमरे हैं. एक कमरे में कार्यालय चलता है और दूसरे कमरे में एक साथ कई कक्षाओं के बच्चे बैठते हैं.
कई बार शिकायत, फिर भी इंतजार
स्कूल के सहायक शिक्षक पवन कुमार चौधरी के मुताबिक, भवन की हालत काफी खराब है और इसकी जानकारी विभाग के अधिकारियों से लेकर बड़े अधिकारियों तक दी जा चुकी है. ग्रामीण भी कई बार अपनी बात प्रशासन तक पहुंचा चुके हैं और धरना-प्रदर्शन भी कर चुके हैं. लेकिन अभी तक बच्चों को जर्जर भवन से राहत नहीं मिली है.
शिक्षक संजीव कुमार ने भी बताया कि कमरे कम होने की वजह से एक साथ तीन कक्षाओं को पढ़ाना पड़ रहा है. इससे बच्चों की पढ़ाई में परेशानी होती है.
अभिभावकों को भी सता रहा डर
ग्रामीण और अभिभावक दुखी कुमार यादव का कहना है कि स्कूल भवन को लेकर कई बार आवाज उठाई गई है. उनका कहना है कि भवन की हालत देखकर अभिभावकों को बच्चों की सुरक्षा की चिंता रहती है. ग्रामीणों की मांग है कि प्रशासन स्कूल का जल्द निरीक्षण करे और नया भवन बनाया जाए.
बताया जा रहा है कि स्कूल भवन की बदहाली का मामला विधानसभा में भी उठाया जा चुका है. अब जिला स्तर से पुराने भवन को हटाकर नया भवन बनाने की प्रक्रिया शुरू किए जाने की बात सामने आ रही है. हालांकि नया भवन कब तक तैयार होगा, इसकी कोई तय समयसीमा अभी साफ नहीं है.
सवाल सीधा है, जिस जगह बच्चों को सुरक्षित माहौल में पढ़ना चाहिए, वहां छत को बेंच और ईंटों के सहारे रोकने की नौबत क्यों आई और 191 बच्चों को इस खतरे से बाहर निकालने के लिए आखिर कब तक इंतजार करना पड़ेगा.