Bihar

बिहार: नहीं रहे ‘धरती पकड़’ नागरमल बाजोरिया, 284 बार लड़ा था चुनाव

Rajnish Sinha
Rajnish Sinha
Sr. Copy Editor

भागलपुर (BHAGALPUR): चुनावी राजनीति में अपनी अनोखी पहचान बनाने वाले समाजसेवी नागरमल बाजोरिया का निधन हो गया. ग्राम पंचायत से लेकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव तक अपनी उम्मीदवारी पेश करने वाले बाजोरिया को लोग ‘धरती पकड़’ के नाम से जानते थे. चुनाव में लगातार हार मिलने के बावजूद लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेने का उनका उत्साह कभी कम नहीं हुआ.

लाहौर में हुआ था जन्म, भागलपुर बना कर्मभूमि 

नागरमल बाजोरिया का जन्म पाकिस्तान के लाहौर में हुआ था. आजादी से पहले ही उनका परिवार भागलपुर आकर बस गया था. इसके बाद भागलपुर उनकी कर्मभूमि बन गई. सामाजिक गतिविधियों के साथ चुनाव लड़ने के उनके जुनून ने उन्हें शहर ही नहीं, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में पहचान दिलाई.

284 बार किया नामांकन,281 बार लड़े चुनाव 

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक नागरमल बाजोरिया ने अपने जीवन में कुल 284 बार चुनाव के लिए नामांकन किया. इनमें तीन बार उनका नामांकन रद्द हुआ, जबकि 281 बार उन्होंने चुनावी मुकाबले में हिस्सा लिया. एक अन्य रिकॉर्ड में उनके 278 से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ने का उल्लेख मिलता है.चुनाव प्रचार का उनका तरीका भी बेहद अलग था. बताया जाता है कि प्रचार के दौरान उन्होंने गधे का भी इस्तेमाल किया था. लगातार चुनावी हार के बावजूद उन्होंने उम्मीदवार बनने का सिलसिला लंबे समय तक जारी रखा.

इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के खिलाफ भी उतरे मैदान में 

बाजोरिया ने कई बड़े राजनीतिक चेहरों के खिलाफ चुनाव लड़ा. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ उन्होंने रायबरेली से अपनी किस्मत आजमाई, जबकि राजीव गांधी के खिलाफ अमेठी के चुनावी मैदान में उतरे.उनकी चुनावी महत्वाकांक्षा लोकसभा या विधानसभा तक सीमित नहीं थी. उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में ज्ञानी जैल सिंह से लेकर प्रणब मुखर्जी तक के मुकाबले नामांकन करने की कोशिश की. वर्ष 2012 में प्रणब मुखर्जी के खिलाफ राष्ट्रपति चुनाव के लिए किया गया उनका नामांकन रद्द हो गया था.

जीत नहीं, लोकतंत्र में भागीदारी था उद्देश्य 

नागरमल बाजोरिया का मानना था कि चुनाव लड़ने के पीछे उनका मकसद सत्ता या जीत हासिल करना नहीं था. वह लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक की भागीदारी के विचार को मजबूत करना चाहते थे.स्वास्थ्य संबंधी कारणों के चलते वह 2019 के लोकसभा चुनाव में मैदान में नहीं उतर सके. 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा. उनके निधन के साथ भागलपुर ने एक ऐसे शख्स को खो दिया, जिसने हार-जीत से अलग चुनावी लोकतंत्र में भागीदारी को अपनी विशिष्ट पहचान बना लिया.

 

TagsBihar