धनबाद(DHANBAD): निगम चुनाव को लेकर भी धनबाद में पूर्व सांसद पशुपतिनाथ सिंह की चर्चा है. चर्चा इसलिए है कि तीन दशक से भी अधिक समय तक अपने सार्वजनिक जीवन में पहली बार उन्होंने धनबाद में मेयर पद के लिए अपने छोटे बेटे का नाम आगे किया है. पार्टी का क्या निर्णय होगा, यह तो भविष्य के गर्भ में है. लेकिन यह पहला मौका होगा, जब उन्होंने अपने परिवार के किसी सदस्य को राजनीति में लाने की इच्छा व्यक्त पार्टी के समक्ष की हो. तीन दशक से भी अधिक समय तक धनबाद की राजनीति में वह "अजातशत्रु" की भूमिका में रहे. "चुप रहने" और बिना जांच पड़ताल के प्रतिक्रिया नहीं देने की राजनीति ने उनको यहां तक पहुंचाया. यह अलग बात है कि 2024 में उन्हें भाजपा ने धनबाद लोकसभा से टिकट नहीं दिया और उसके बाद भी वह राजनीति में सक्रिय हैं.पार्टी में अभी भी उनकी पूछ है.
भाजपा से चुनाव लड़ने वालो की है बहुत लम्बी सूची
वैसे, तो धनबाद नगर निगम में भाजपा के भरोसे चुनाव लड़ने वालों की लंबी सूची है. भाजपा ने जो रायशुमारी कमेटी गठित की है. उसके सामने किसी एक उम्मीदवार पर राय बनाना बहुत आसान नहीं होगा. क्योंकि अब तो नामांकन की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है .पूर्व मेयर शेखर अग्रवाल गुरुवार को नामांकन दाखिल कर दिया .इसके अलावे झरिया के पूर्व विधायक संजीव सिंह ने भी प्रदेश अध्यक्ष को पत्र लिखकर मेयर चुनाव लड़ने की इच्छा व्यक्त की है .सांसद ढुल्लू महतो की पत्नी सावित्री देवी के नाम को भी कई मंडल अध्यक्षों ने आगे किया है .इसके अलावे भी दर्जनों भाजपा समर्थित उम्मीदवार हैं. वैसे तो कांग्रेस में भी कई उम्मीदवार हैं .झामुमो ने भी डॉक्टर नीलम मिश्रा को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है. कुल मिलाकर देखा जाए तो धनबाद में निगम का चुनाव रोचक होगा.
पशुपति नाथ सिंह ने भी लड़ा था नगरपालिका अध्यक्ष का चुनाव
इस बीच एक रोचक जानकारी यह मिली है कि धनबाद के पूर्व सांसद पशुपतिनाथ सिंह 1988 में नगर पालिका के अध्यक्ष का भी चुनाव लड़ा था. उस समय उनके प्रतिद्वंदी अशोक साव के लिए संकट पैदा कर दी थी. लेकिन बुजुर्ग बताते हैं कि उस समय के विधायक एसपी राय का एक वोट भारी पड़ गया और पशुपतिनाथ सिंह अध्यक्ष का चुनाव हार गए. अशोक साव नगर पालिका के अध्यक्ष चुन लिए गए. यह भी बताया जाता है कि यह चुनाव बहुत रोचक हुआ था. अपने पक्ष में वोटिंग के लिए कथित रूप से अशोक साव ने वार्ड पार्षदों को अपने समर्थकों के साथ कहीं बाहर भेज दिया था और वह लोग वोटिंग के समय ही बैंक मोड़ स्थित नगर पालिका कार्यालय पहुंचे थे. उस समय पशुपतिनाथ सिंह 19 नंबर वार्ड से पार्षद थे. खैर, 1995 में जब पशुपतिनाथ सिंह चुनावी राजनीति में मजबूती के साथ प्रवेश किया तो कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. तीन बार के विधायक, तीन बार के सांसद, झारखंड भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और मंत्री पद का रिकॉर्ड उनके खाते में दर्ज है. उनके समर्थक आज भी उन्हें अपराजिता सांसद बताते हैं.
1988 के बाद धनबाद नगरपालिका का चुनाव ही नहीं हुआ
बुजुर्ग बताते हैं कि 1988 में जब नगर पालिका का चुनाव हुआ था, तो कुल 30 वार्ड थे. नगर पालिका चुनाव का कार्यकाल खत्म हो जाने के बाद तत्कालीन बिहार सरकार ने इसका एक्सटेंशन दिया था. उसके बाद नगर पालिका का चुनाव हुआ ही नहीं .सीधे 2010 में नगर निगम का चुनाव हुआ. धनबाद में 1 दिसंबर 2006 को निगम का गठन हुआ था .10 लाख की आबादी पूरी होने के बाद कई इलाकों को मिलाकर निगम बनाया गया .लेकिन 2006 के गठन के बाद चुनाव हुआ 2010 में .यह चुनाव भी काफी रोचक रहा और इंदु देवी पहली मेयर चुनी गई. दिवंगत कांग्रेस नेता नीरज सिंह डिप्टी मेयर चुने गए. 5 साल तक कार्यकाल चला. उसके बाद 2015 में चुनाव हुआ. 2015 के चुनाव में शेखर अग्रवाल मेयर चुने गए. तो दिवंगत नीरज सिंह के भाई एकलव्य सिंह डिप्टी मेयर बने. कार्यकाल खत्म हो जाने के बाद अब 2026 में चुनाव होने जा रहा है और यह चुनाव भी कम रोचक होता नहीं दिख रहा है.
रिपोर्ट -धनबाद ब्यूरो
