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कौन थे विनोद बिहारी महतो -जिन्होंने झारखंड आंदोलन को नई दिशा दी, सुदूर इलाकों में शिक्षा की अलख जगाई !

BY -
Satya Bhushan Singh   Dhanbad
Satya Bhushan Singh Dhanbad
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 14, 2026, 1:23:30 PM

धनबाद(DHANBAD) : झारखंड आंदोलन के पुरोधा विनोद बिहारी महतो को झारखंड कभी भुला नहीं सकता है. कहा जा सकता है कि वह झारखंड की "आत्मा" थे. उन्होंने कई दशक पहले नारा दिया था- "पढ़ो और लड़ो", शिक्षा के प्रति उनका सर्वाधिक झुकाव था. शिक्षण संस्थानों के प्रति उनकी विशेष रुचि रहती थी. वकालत के पेशे से जुड़े विनोद बाबू झारखंड आंदोलन के अगुवा  में से एक थे. झारखंड मुक्ति मोर्चा के गठन में उनकी बड़ी भूमिका थी. वह पार्टी के अध्यक्ष भी रहे. धनबाद के बलियापुर में जन्मे विनोद बाबू कुड़मी महतो समुदाय के थे.  एक सामान्य किसान परिवार में जन्मे विनोद बिहारी महतो ने जीवन भर शोषित, वंचित वर्गों के लिए संघर्ष किया. वह पॉलिटीसीएन  से अधिक समाज सुधारक थे. शिक्षा को उन्होंने समानता का हथियार बनाया.  झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक के रूप में अलग राज्य की मांग को पहचान दी.  

18 दिसंबर 1991 को दिल्ली के अस्पताल में उनका निधन हो गया

18 दिसंबर 1991 को दिल्ली के अस्पताल में उनका निधन हो गया.  लेकिन उनका कृतित्व और व्यक्तित्व आज भी झारखंड की राजनीति और समाज को सीख देती है और आगे भी देती रहेगी.  बहुत कम लोग जानते होंगे कि वह धनबाद के डीसी कार्यालय में किरानी की नौकरी करते थे.  लेकिन उन्हें एक अधिवक्ता की बात ऐसी लागी कि नौकरी को तिलांजलि दे दी और वकील बनने की ठान ली.  और ऐसा कर उन्होंने दिखाया भी. गरीबी में पले बढ़े, लेकिन कभी हार नहीं मानी. पैदल या साइकिल से स्कूल जाते थे, लेकिन संकटों में कभी डिगे  नहीं.  तीन बार के विधायक और एक बार के सांसद विनोद बाबू की जीवनी एक संघर्ष गाथा है.  1980 और 1985 में टुंडी से विधायक बने. 1990 में सिंदरी के विधायक चुने गए. 1991 में गिरिडीह लोकसभा सीट से सांसद निर्वाचित हुए.  नौकरी त्यागने के बाद वह पटना लॉ कॉलेज से वकालत की डिग्री ली और धनबाद की अदालत में प्रेक्टिस करने लगे.  उन्होंने वकील बनकर पंचेत -मैथन डैम, सिंदरी कारखाना और बोकारो स्टील प्लांट  जैसी परियोजनाओं की वजह से विस्थापित हुए गरीबों के मुकदमे लड़े . 
 
विनोद बाबू को क्यों कहा जाता है झारखंड आंदोलन का असली सूत्रधार 
 
विनोद बाबू को झारखंड आंदोलन का असली सूत्रधार कहा जाता है.  4 फरवरी 1973 को धनबाद के गोल्फ ग्राउंड में झामुमो  का गठन हुआ. विनोद बिहारी महतो इसके अध्यक्ष बने. यह अलग बात है कि शिबू सोरेन और एके राय भी उस समय साथ थे. लेकिन बाद में एके राय के विचार बदले और वह अपनी अलग पार्टी बना ली.  यह अलग बात है कि देश की राजनीति में अब कोई दूसरा एके राय नहीं हो सकता और नहीं झारखंड में कोई विनोद बिहारी महतो हो सकता है. उनकी सोच ,उनका प्रयास हमेशा शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के रहे.  "पढ़ो और लड़ो " का नारा देकर उन्होंने ग्रामीण-आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा का प्रसार किया. वकालत से जब कुछ पैसे आने लगे तो सुदूर गांव में स्कूल -कॉलेज खोले. स्कूल संचालक के लिए फीस न्यूनतम रखा गया. धनबाद में विनोद बिहारी महतो कोलांचल विश्वविद्यालय उन्हीं के नाम पर स्थापित हुआ है. 

विनोद बाबू की जीवनी पर एक नजर 

1923 में 23 सितंबर को धनबाद के बड़ादाहा में जन्म,1948 में बलियापुर बोर्ड मध्य विद्यालय में शिक्षक बने,1950 में क्लर्क की नौकरी छोड़कर वकालत पढ़ने चले गये,वकील बनने के बाद विस्थापितों का मुकदमा लड़ना शुरू किया,1960 में शिवाजी समाज की स्थापना की, सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया,1967 में सीपीएम में शामिल हो गये. धनबाद नगरपालिका के वार्ड आयुक्त बने,1971 में धनबाद लोकसभा का चुनाव लड़ा. दूसरे स्थान पर रहे, 1973 में झामुमो गठन किया, MISA के तहत गिरफ्तार किये गये,1980-1990 तक विधायक रहे. 1980 और 1985 में टुंडी से जीते. फिर 1990 में सिंदरी के विधायक चुने गये,1987 में JCC में शामिल हुए. अलग झारखंड राज्य के आंदोलन को तेज किया,1991 में गिरिडीह लोकसभा सीट से सांसद निर्वाचित हुए, 1991 में 18 दिसंबर को दिल्ली में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया.

रिपोर्ट-धनबाद ब्यूरो 

Tags:DhanbadjharkhandPurodhaWinod BabyEducation

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