रांची(RANCHI): पड़हा राजा सोमा मुंडा की हत्या क्यों हुई. यह सवाल हर किसी के मन में है. क्या सिर्फ जमीन विवाद में राजा के सीने में गोलियां उतार दी गई. या फिर कहानी कुछ और है. आखिर आदिवासी अगुआ को बीच सड़क पर मार दिया गया. इस घटना के बाद आदिवासियों में ग़ुस्सा है और पूरे झारखंड को 17 जनवरी यानि आज बंद कर दिया. इस खबर में समझेंगे की आखिर ग्राम सभा क्या है और पड़हा राजा की भूमिका क्या रहती है.
सबसे पहले बात उस दिन की कर लेते है जब खूंटी में अचानक 7 जवानरी को गोली चली जिसमें आदिवासी नेता पड़हा राजा सोमा मुंडा की मौत हो गई. जब खूंटी से सोमा मुंडा लौट रहे थे तभी जमुआदाग के पास अपराधियों ने चलती बाइक पर उन्हे सामने से गोली मार दी. जिसमें उनकी जान चली गई. जिस समय गोली चलाई गई उस वक्त सोमा मुंडा के साथ उनकी पत्नी भी बाइक पर मौजूद थी. लेकिन अपराधियों ने सीधा टारगेट किया. सोमा मुंडा की पत्नी किसी तरह से उन्हे ट्रैक्टर से खूंटी लेकर पहुंची. जहां डॉक्टरों ने देखते ही मृत घोषित कर दिया.
इस घटना की खबर पूरे झारखंड में फैली की सोमा मुंडा की सरेराह गोली मार कर हत्या कर दी गई. आदिवासी नेताओं से लेकर आदिवासी संगठन के अगुआ खूंटी अस्पताल पहुंचे और फिर पुलिस से अपराधियों की गिरफ़्तारी की मांग की. घटना के दूसरे दिन यानि आठ जनवरी को खूंटी बंद कर दिया. सभी गाड़ियों के पहिये थम गया. आदिवासी नेता सड़क पर बैठ गए और सोमा के हत्यारे की गिरफ़्तारी की मांग करने लगे. घटना के एक सप्ताह बाद 13 जनवरी को सोमा मुंडा केस में खूंटी पुलिस ने 7 आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.
जिसमें खूंटी एसपी ने बताया कि हूटार में एक 3.16 एकड़ जमीन को विवाद को लेकर हत्या की गई है. इसमें सोमा मुंडा के ही गाँव के 6 और एक रांची के किशोर गंज के रहने वाले देवव्रत नाथ शाहदेव को भेज दिया. और बताया गया कि सोमा मुंडा ने जमीन कब्जा करने से रोकने का काम किया था. जिसमें उनकी जान चली गई.
अब सवाल है कि आखिर सोमा मुंडा जमीन विवाद में कैसे आगए. तो यहां समझने वाली बात है कि सोमा मुंडा पड़हा राजा थे. 22 गाँव के लोगों के हर मामले में वह स्थानीय स्तर पर ग्राम सभा के जरिए मामले का हल करने का काम करते थे. यह अधिकार उन्हे पाँचवी अनुसूची के तहत मिला है. जिसके लिए पेसा कानून भी झारखंड में लागू हुआ है. पेसा के तहत ग्राम सभा और मजबूत हुआ.
जिसमें उन्हे कई अधिकार मिले. लेकिन जब आदिवासी जमीन के मामले में हस्तक्षेप करते है तो फिर वह खुद सुरक्षित नहीं होते है. ऐसे कई मामले झारखंड में है. जहां जमीन विवाद में हर दिन आदिवासी की जान जाती है.
पेसा कानून भी आदिवासियों को मिला लेकिन अभी भी ग्राम सभा मजबूत नहीं हो पाई. नतीजा है कि आदिवासी के खून से उनकी जमीन लाल होती है. और हर बार अश्वशन के बाद भी सुरक्षा महज दवा तक सीमित रह जाती है. अपने ही राज में आज आदिवासी गैर के जैसे हो गए और अपनी जल जंगल जमीन को बचाने के लिए लड़ाई लड़ रहे है कभी सिस्टम के खिलाफ तो कभी माफिया के खिलाफ
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