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क्या है लोबिन की राजनीति, हेमंत के साथ या भाजपा के खास? 2024 में किसके लिए बनेंगे चुनौती

BY -
Samir Hussain
Samir Hussain
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 14, 2026, 10:15:59 AM

रांची(RANCHI): झारखंड में अभी से ही सभी राजनीति पार्टी 2024 के चुनाव की तैयारी में लग गई है. सभी अपने-अपने दांव पेंच अपनाने में लगे हैं. झामुमो भी चुनावी मैदान में कूदी हुई है, लेकिन झामुमो की राह 2024 में आसान नहीं दिख रही है. झामुमो को सिर्फ भाजपा का ही नहीं बल्कि झामुमो के ही बागी विधायक लोबिन हेम्ब्रम का भी सामना करना होगा. विधायक लोबिन हेम्ब्रम झामुमो के वरिष्ठ नेता हैं. लेकिन अपनी ही सरकार पर मुखर होकर आवाज उठाने के लिए चर्चा में बने रहते हैं. कई बार विधायक ने खुल कर कहा कि वह हेमंत सोरेन को नेता नहीं मानते है. हाल की बात करें स्थानीय नीति, नियोजन नीति, शराब बिक्री को लेकर आंदोलन कर चुके हैं. वहीं पारसनाथ को लेकर भी बड़े आंदोलन की शंखनाद कर चुके हैं. विधायक लोबिन हेम्ब्रम संथाल से आते हैं. लगातार पांच बार बोरियो से विधानसभा का चुनाव जीतते आ रहे है. लोबिन हेम्ब्रम अपने बयानों को लेकर हमेशा सुर्खियों में रहते हैं.   

पारसनाथ को लेकर सरकार के खिलाफ बड़ा आंदोलन की तैयारी

लोबिन हाल में पारसनाथ बचाने के लिए एक बड़े आंदोलन की रूप रेखा तैयार कर रहे हैं. इस आंदोलन की शुरुआत भी कर चुके हैं. गिरिडीह के मधुबन में एक जन आक्रोश रैली 10 जनवरी को की गई. इस रैली का नेतृत्व झामुमो विधायक कर रहे थे. इस सभा में केंद्र और राज्य सरकार के खिलाफ जम कर बरसे थे. इस दौरान लोबिन ने अपने ही मुख्यमंत्री के खिलाफ बगावत के बोल बोले थे. लोबिन ने कहा था कि मुख्यमंत्री भले आदिवासी हैं लेकिन वह कभी भी आदिवासियों का भला नहीं कर सकते. हेमंत सोरेन के साथ रहने वालों के बारे में भी उन्होंने कड़े शब्दों में आलोचना किया था. उन्होंने सीधे नाम लेकर प्रेस सलाहकार पिंटू, विधायक प्रतिनिधि पंकज मिश्रा, झामुमो नेता सुप्रियो भट्टाचार्य और विनोद पांडे को बाहरी बताया था. इतना ही नहीं लात मार कर भगाने की बात कह डाली थी.

सदन में कई बार मुख्यमंत्री पर सवाल उठाया

1932 खातियान को लेकर विधानसभा के बजट सत्र के दौरान लोबिन हेम्ब्रम भावुक हो गए थे. उन्होंने कहा कि मुझे कभी बोलने का मौका नहीं दिया जाता है. झारखंड में लोग सड़क पर हैं, मुझे उनकी बात करनी है. लेकिन यह मेरे लिए पीड़ा दायक है कि अपनी ही सरकार में सदन में बोलने का मौका नहीं दिया जाता. जो हमने वादा झारखंड के लोगों से किया था. उसपर सरकार काम नहीं कर रही है. सरकार अपने वादों से मुकर रही है. जल जंगल जमीन हमारा और आज हमारे ही बेटे बेरोजगार घूम रहे है. झारखंड की अधिकतर नौकरियों पर बाहरियों का कब्जा है. लेकिन सरकार को इसकी फिक्र नहीं है. उन्होंने मुख्यमंत्री पर वादा खिलाफी का आरोप लगाया था.      

मुख्यमंत्री को नहीं मानते नेता

झामुमो के टिकट पर चुनाव लड़ कर विधायक बनने वाले लोबिन अपने पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष और सूबे के मुखिया हेमंत सोरेन को नेता नहीं मानते है. लोबिन अपने कई बयानों में बोलते हुए दिखे है कि हेमंत सोरेन उनका नेता नहीं है. उनके नेता सिर्फ और सिर्फ गुरुजी है. गुरुजी को ही वह नेता मानते है. लोबिन का मानना है कि गुरुजी के बताए हुए मार्ग पर ना चल कर हेमंत सोरेन अलग चल रहे हैं. गुरुजी आदिवासियों के उत्थान के बारे में सोचते थे. लेकिन हेमंत सोरेन बात तो आदिवासी की करते हैं लेकिन फायदा बाहरी को पहुंचाते हैं. वह सदन के नेता हैं लेकिन उनके नेता नहीं.

झारखंड बचाव मोर्चा बनाया

लोबिन हेम्ब्रम ने झारखंड बचाव मोर्चा का गठन किया है. इस मोर्चा के जरिए भी सरकार पर हमलावर दिखे है. इस मोर्चा का नाम झारखंड बचाव मोर्चा रखने के पीछे बताते है कि झारखंड में जल, जंगल, जमीन लूटी जा रही है, इसी को बचाने के लिए गठन किया गया है. लोबिन हेम्ब्रम भले ही इसे राजनीति पार्टी ना बनाए लेकिन एक विकल्प अपने पास रखे हुए है. हो सकता है कि आगे चल कर झामुमो से और खटास बढ़ेगी तो 2024 के चुनाव में इसे राजनीति पार्टी में भी तब्दील कर दे. ऐसी चर्चा है कि लोबिन के बगावती तेवर को देखते हुए झामुमो भी अपने विकल्प पर चर्चा कर रही है.

क्या लोबिन भाजपा के लिए बनेंगे खास? 

झामुमो के विरोध में सुर बुलंद होते ही लोबिन के समर्थन में भाजपा सोशल मीडिया पर सक्रिय हो गई है. लोबिन के द्वारा सीएम के विरोध में दिए गए भाषण के क्लिप को पोस्ट कर भाजपा सरकार को घेर रही है. ऐसे में लोग कयास लगा रहे हैं कि लोबिन भाजपा के लिए संथाल में खास चेहरे बन सकते हैं. इससे चर्चा यह भी है कि अगर लोबिन पर झामुमो कार्रवाई करती है तो वह भाजपा के खेमे में चले जाए. लेकिन लोबिन इतने कच्चे खिलाड़ी नहीं है,पहले भी एक बार विधानसभा में लोबिन का टिकट कटा था तो वह निर्दलीय ही चुनाव मैदान में उतर गए थे. इस चुनाव में भाजपा और झामुमो को करारी हार का सामना करना पड़ा था. वहीं लोबिन की पूरी राजनीति ही आदिवासियों के भरोसे है. लोबिन कभी दूर-दूर तक भाजपा के साथ जाने का नहीं सोचेंगे. क्योंकि लोबिन का खुद का संथाल में जनाधार है.                                   

             

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