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दुर्भाग्यपूर्ण!राज्य गठन के 23 साल बाद भी चाईबासा के इस क्षेत्र में नहीं पहुंचा विकास, आज भी डंडे में चादर बांधकर मरीज को पहुंचाया जाता है अस्पताल

BY -
Priyanka Kumari CE
Priyanka Kumari CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 14, 2026, 8:33:46 PM

चाईबासा(CHAIBASA):झारखंड सरकार की ओर से राज्य के निचले और पिछड़े पैदान पर रहनेवाले लोगों तक हर सुविधा पहुंचाने का दावा करती है, लेकिन सरकार के ये दावे हकीकत में धरातल पर नहीं दिखते है. सरकार के दाबे को किस कदर खोखली है उसे देखना हो तो पश्चिमी सिंहभूम जिलें के घोर नक्सल प्रभावित सारंडा के सुदूरवर्ती नुईयागड़ा गांव जा कर देखें. जहां के लोग सरकार के तमाम प्रकार के सरकारी जन कल्याणकारी योजनाओं से वंचित है.यहां आज भी लोगों को अस्पताल जाने के लिए अच्छी सड़क और एम्बुलेंस का अभाव की वजह से मरीजों को  डंडे में कपड़ा बांधकर लोग अस्पताल पहुंचाते है, जो काफी दुर्भाग्यपूर्ण है.

आज भी डंडे में चादर बांधकर मरीज को पहुंचाया जाता है अस्पताल

ताजा मामला इसी क्षेत्र से शुक्रवार को गंभीर रुप से बीमार 41 बर्षीय सोमा लोम्गा को गांव के ही कुछ स्कूली बच्चों ने लकड़ी के डंडे में चादर बांधकर और उस चादर में बैठाकर लगभग 3 किलोमीटर ऊंची पहाड़ी को पार कर कुमडीह रोड तक लाया गया. यहां से सेल प्रबंधन की ओर से भेजे गये वाहन से मरीज को सेल की किरीबुरु अस्पताल लाया गया. जहां मरीज का इलाज किया जा रहा है.

सारंडा का नुईयागड़ा, बोड़दाभठ्ठी और रांगरींग गांव विकास से कोसों दूर है

आपको बताये कि सारंडा का नुईयागड़ा, बोड़दाभठ्ठी और रांगरींग गांव विकास से कोसों दूर है. यह तीनों गांव आसपास के हैं. तीनों गांव वर्षों पूर्व अवैध तरीके से जंगल काटकर बसाया गया है. इन गांवों में रहनेवाले लोगों के पास सिर्फ मतदाता पहचान पत्र, आधार और राशन कार्ड है. इसके अलावा सरकार की कोई योजना गांव तक नहीं पहुंची है.

सड़क, बिजली, स्कूल, आंगनबाड़ी, पेयजल, संचार किसी प्रकार की कोई सुविधा नहीं है

तीनों गांव किरीबुरु से लगभग 15-20 किलोमीटर की दूरी पर है. तीनों गांवों में सड़क, बिजली, स्कूल, आंगनबाड़ी, पेयजल, संचार किसी प्रकार की कोई सुविधा नहीं है. दो वर्ष पूर्व इन गांवों की खराब स्थिति की खबर छपने के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने संज्ञान लेकर कोल्हान के तमाम बडे़ पुलिस-प्रशासन के उच्च अधिकारियों को दो बार गांव भेजा. तमाम अधिकारी  इन गांवों में तो जैसे-तैसे चले गये थे, लेकिन वापस आने में सभी की सांसें फूल गई थीं, रुहें कांप गई थीं. सारे अधिकारी गांव तक सड़क, स्कूल, पानी, एम्बुलेंस आदि सुविधा की बात कह कर गये, लेकिन आज तक हुआ कुछ नहीं.यही वजह है कि गांव के मरीज इलाज के अभाव में गांव में ही दम तोड़ देते हैं. या फिर कुछ मरीज ऐसे बच्चों के साहसीक प्रयास की वजह से अस्पताल तक पहुंच मौत से बच जाते हैं.

डीएमएफटी फंड भारी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जा रही है

वहीं गांव के स्कूली बच्चे 15 किलोमीटर दूर स्कूल होने की वजह से पढा़ई छोड़ देते हैं या फिर कुछ सेल प्रबंधन के रहमों करम से किरीबुरु में रहकर कुछ पढ़ पाते हैं. सारंडा की खदानें डीएमएफटी फंड में प्रतिवर्ष सैकड़ों करोड़ देती है. लेकिन इन पैसों से यहां के लोगों का किसी भी प्रकार का विकास नहीं हो पा रहा है. डीएमएफटी फंड भारी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जा रही है और इसके असली लाभार्थियों को तिल-तिल कर मरना पड़ रहा है.

रिपोर्ट:संतोष वर्मा

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