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कोयलांचल के "संत" एके राय की आज है जयंती तो "बेताज बादशाह "सूर्यदेव सिंह की पुण्यतिथि 

BY -
Satya Bhushan Singh   Dhanbad
Satya Bhushan Singh Dhanbad
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 13, 2026, 1:17:57 AM

धनबाद(DHANBAD): धनबाद कोयलांचल  के दो बड़े चेहरे में से एक का आज जन्मदिन है तो दूसरे की  पुण्यतिथि. एक को राजनीति के संत कहा गया तो दूसरे को बेताज बादशाह.  पूर्व सांसद एके राय की  आज जयंती है, तो कोयलांचल के बेताज बादशाह रहे  सूर्यदेव सिंह कि पुण्यतिथि है.  दोनों शख्सियत विचारधारा से अलग-अलग थे.  दोनों ने कोयलांचल को अपना कर्मभूमि बनाया.  एक उत्तर प्रदेश के बलिया से धनबाद आए तो दूसरे एक  समय के बांग्लादेश से धनबाद पहुंचे.  दोनों आज इस दुनिया में नहीं है, लेकिन दोनों की चर्चाएं आज भी खूब होती है.  एके  राय तो राजनीति के संत कहे जाते थे.  पूरा जीवन सादगी की  प्रति मूर्ति बने रहे.  तीन बार धनबाद लोकसभा से चुनाव जीते, लेकिन सरकार की किसी भी सुविधा को ग्रहण नहीं किया.  यहां तक की जब बृद्ध  हो गए, हाथ -पैर काम नहीं करने लगे तो भी वह अपने परिवार के पास जाने के बजाय, कार्यकर्ता के घर रहना पसंद किया. 

धनबाद के सेंट्रल हॉस्पिटल में  एके राय ने अंतिम सांस ली 
 
धनबाद के सेंट्रल हॉस्पिटल में उन्होंने अंतिम सांस ली. ऐसी बात नहीं है कि बृद्ध होने के बाद उनके परिवार वालों ने उनसे घर चलने का आग्रह  नहीं किया, लेकिन इस अनुरोध  को भी उन्होंने ठुकरा दिया और धनबाद की मिट्टी में ही अंतिम सांस ली. धनबाद के पूर्व सांसद एके राय इसलिए याद नहीं किए जाते हैं कि वह सिंदरी से तीन बार के विधायक रहे. धनबाद से तीन बार के सांसद रहे, बल्कि उन्हें याद इसलिए किया जाता है कि एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्मे, अच्छी यूनिवर्सिटी में शिक्षा लेने के बाद भी अच्छी  नौकरी छोड़कर फटेहाल  जिंदगी जीने का निर्णय लिए. कोयलांचल की जनता को संगठित करने जैसे कठिन काम करने का फैसला लिया. सिंदरी के मजदूरों की पीड़ा देखकर उन्होंने अपनी  इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ी और सिंदरी के निकट बलियापुर क्षेत्र के अशिक्षित गांव की ओर चल दिए.  यह  समय 1966 के आसपास का था.  एके  राय बेजुबानों की आवाज बन  कर पीड़ित जनता के सामने उभरे. 1977 में जेल से ही उन्होंने नामांकन किया और जेल से ही धनबाद के  सांसद का चुनाव जीत लिया.  यह चुनाव "खिचड़ी' के भरोसे लड़ा गया था.  कार्यकर्ता ही खिचड़ी के लिए चावल, दाल, नमक  का जुगाड़ करते थे, बनाते थे  और फिर प्रचार करते थे. चुनाव का परिणाम जब आया तो वह चुनाव जीत चुके थे.  

1960 के दशक में धनबाद आए थे सूर्यदेव सिंह 

इसी  प्रकार उत्तर प्रदेश के बलिया के गुनिया छपरा गांव से 1960 के दशक में धनबाद आए  सूर्यदेव  सिंह को यह पता नहीं रहा होगा कि आगे चलकर वह कोयलांचल  के बेताज बादशाह बन जाएंगे और पूरे देश में उनकी ख्याति होगी.  कोयलांचल में कई नाम से वह पुकारे जाते रहे है. कोई उन्हें डॉन कहता था  तो कोई कोयला किंग कहता था , तो कोई माफिया कहता था तो कोई मसीहा बताता था. 1960 में सूर्य देव सिंह धनबाद आए तो पहले उनका ठिकाना भौरा  बना था.  वहां वह किसी संबंधी के पास ठहरे थे, लेकिन स्वभाव से स्वाभिमानी और आत्मविश्वासी सूर्य देव सिंह ने किसी बात को लेकर संबंधी का घर छोड़ दिया. उसके बाद कुसुंडा के बोर्रा गढ़  में रहने लगे.  रोजगार की तलाश में जुट गए.  पहलवानी का उन्हें बड़ा शौक था. उस समय जगह-जगह अखाड़े  आयोजन होता था.  जिसमें वह हिस्सा लेने लगे और पहलवानी में उनकी चल निकली. उस समय कोयलांचल में बीपी सिन्हा की खूब चलती थी. बीपी सिन्हा की उनपर नजर पड़ी ,फिर उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. 1977 ,1980, 1985 और  1990 में झरिया विधानसभा का प्रतिनिधित्व किया.

रिपोर्ट -धनबाद ब्यूरो  

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