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TNP SPECIAL-चाक की तरह घूमती रही है धनबाद के निरसा की राजनीति, देखिये कैसे श्रेय लेने की होड़ का केंद्र बना ₹38 करोड़ का ROB

BY -
Satya Bhushan Singh   Dhanbad
Satya Bhushan Singh Dhanbad
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 14, 2026, 8:51:58 PM

धनबाद(DHANBAD): धनबाद के निरसा विधानसभा की राजनीति  चाक की तरह घूमती रही है.  कभी यहां लगातार वामदलों का कब्जा रहा तो अभी इस विधानसभा क्षेत्र से भगवा लहरा रहा है.  निरसा की राजनीति एक बार फिर उफान मार रही है. पूर्व विधायक अरूप चटर्जी एक तरफ है तो  भाजपा, कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा, राजद खिलाफ में खड़े है. वजह बना है ₹38 करोड़  की लागत से बने ओवर ब्रिज का श्रेय लेने की होड़. शनिवार को इसका विधिवत उद्घाटन होना था, आज हुआ भी, झारखंड के परिवहन मंत्री चंपई सोरेन ने पुल का विधिवत लोकार्पण किया. लेकिन इसके पहले ही शुक्रवार को पूर्व विधायक और मासस नेता अरूप चटर्जी ने समर्थकों के साथ पहुंचकर पुल का लोकार्पण कर दिया था. साथ में कह दिया कि उन्होंने बड़ी मेहनत कर पुल को बनवाया है, इसलिए लोकार्पण का अधिकार भी उनको है.  कहा कि लोकार्पण उन्होंने कर दिया, अब प्रोटोकॉल के तहत जिसे जो करना है- करे. इस लोकार्पण के बाद राजनीति तेज हो गई है. भाजपा, कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा, राजद के नेताओं ने पूर्व विधायक के इस काम को गलत बताया. कहा कि सभी के सहयोग से ही इस ओवर ब्रिज का निर्माण हुआ है.  

झारखंड के परिवहन मंत्री ने किया लोकार्पण 

पूर्व विधायक अरूप चटर्जी के इस काम के बाद ही रेलवे ने फिर से पुल  को सील कर दिया और शनिवार को फिर इसका विधिवत उद्घाटन हुआ.  निरसा  में एक समय दो कद्दावर नेता हुआ करते थे. गुरुदास चटर्जी, जो निरसा  से तीन बार चुनाव जीते, 1990, 1995 और 2000 में वह निरसा विधानसभा से विधायक रहे. फॉरवर्ड ब्लॉक की राजनीति सुशांतो सेन  गुप्ता कर रहे थे. उनकी पत्नी अर्पणा सेन गुप्ता फिलहाल निरसा  क्षेत्र से विधायक है.  विधायक रहते हुए गुरुदास चटर्जी की हत्या 14 अप्रैल 2000 को कर दी गई थी. सुशांतो सेनगुप्ता की हत्या 5 अक्टूबर 2002 को की गई थी. उनकी हत्या के बाद फॉरवर्ड ब्लॉक के टिकट पर ही अपर्णा सेनगुप्ता निरसा से विधायक भी बनी. फिर वह 2015 में बीजेपी में शामिल हो गई और 2019 के चुनाव में टिकट हासिल कर विधायक बन गई.  उन्होंने सीधे मुकाबले में मासस के अरूप चटर्जी को पराजित किया. हालांकि 2014 के चुनाव से ही निरसा  विधानसभा क्षेत्र में भाजपा की पकड़ बढ़ने लगी थी. 2014 के चुनाव में भाजपा के गणेश मिश्रा मासस के अरूप चटर्जी से मात्र 1035 वोट से हारे थे. लोग उम्मीद कर रहे थे कि 2019 के चुनाव में भी भाजपा गणेश मिश्रा पर ही दांव खेलेगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.  

2019 में अर्पणा सेनगुप्ता को भाजपा से टिकट मिला और जीती 

अपर्णा सेनगुप्ता ने टिकट झटक ली. अरूप चटर्जी दिवंगत गुरुदास  चटर्जी के बेटे हैं, जिस समय उनकी हत्या हुई, उस वक्त  अरूप चटर्जी पढ़ाई कर रहे थे लेकिन पूर्व सांसद एके राय के दबाव में राजनीति में आए और विधायक बन गए. उसके बाद से ही निरसा की राजनीति में उनकी पकड़ बनी रही. गुरदास चटर्जी मूल रूप से बंगाल के पुरुलिया के निवासी थे. उनके भाई रामदास चटर्जी धनबाद के किसी कोलियरी में काम करते थे. बाद में उन्होंने गुरुदास  चटर्जी को भी गांव से निरसा ले आये और प्राइवेट कोलियरी  में काम लगवा दिया. 1975 में जब कोलियारियों  का राष्ट्रीयकरण हुआ तो गुरुदास  चटर्जी ईसीएल की कोलियरी में क्लर्क  के रूप में बहाल हो गए और नौकरी करने लगे. इस बीच एक विवाद में जेल चले गए, जेल से निकलने के बाद वह पूरी तरह से राजनीति करने लगे और निरसा  के लोगों में उनकी पैठ  बढ़ गई. जानकार बताते हैं कि निरसा की राजनीति थोड़ी अलग किस्म की है.  यह भी बताया जाता है कि धनबाद में कोयले के अवैध उत्खनन का जन्म निरसा से ही हुआ था, जो आज पूरे जिले में फैल कर लाइलाज बीमारी बन गया है.

रिपोर्ट -धनबाद ब्यूरो  

Tags:dhanbadnirsapoliticsmccmantri

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