सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके!
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते!!
टीएनपी डेस्क(Tnp desk):-इस साल शरदीय नवरात्र की शुरुआत रविवार से हो रही सुखदायनी और संकटहरणी मां दुर्गा कैलाश पर्वत से अपने मायके यानि पृथ्वी हाथी पर सवार होकर आ रही है. जिस दिन मां धरती पर उतरेगी, उस दिन आश्विन माह के शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि होगी. पंचाग के मुताबिक, आश्विन शुक्ल प्रतिपदा तिथि से शारदीय नवरात्रि शुरू होती है और इसका समापन आश्विन शुक्ल दशमी तिथि को दुर्गा विसर्जन के साथ होगा. इस वर्ष दुर्गा विसर्जन 24 अक्टूबर के दिन मंगलवार को होगा . इसी दिन विजयदशमी यानि दशहरा मनाई जाएगी औऱ रावण का दहन किया जाएगा.
शेर है मां दुर्गा की सवारी
माता अम्बे की सवारी तो सिंह होती है, लेकिन जब वे पृथ्वी पर आती है तो दिन के अनुसार उनकी सवारी बदल जाती है. दिन के हिसाब से उनके आगमन और प्रस्थान की सवारी तय होती है. इस साल शरदीय नवरात्रि में मां शेरोवाली का आगमन हाथी पर हो रहा है, क्योंकि इस बार नवरात्र की शुरुआत रविवार को रही है. इसलिए उनका वाहन हाथी है. बताया जाता है कि नवरात्रि रविवार या सोमवार से प्रारंभ होने पर माता की सवारी हाथी होती है.
मुर्गे पर सवार होकर विदा होगी मां
इस साल शारदीय नवरात्रि का समापन मंगलवार के दिन होने वाला है. लिहाज, मां दुर्गा कैलाश पर्वत अपने घर मुर्गा पर सवारी करके जाएगी, क्योंकि, जब नवरात्रि का समापन मंगलवार या शनिवार को होता है. तो इस दौरान मातारानी की सवारी मुर्गा होता है. हालाकि, मुर्गा पर मां के सवार होकर जाने पर शुभ नहीं माना जाता है. मान्यता है कि इससे कष्ट बढ़ने वाले होते हैं.
14 अक्टूबर को महालया
बांग्ला पंचाग के अनुसार 14 अक्टूबर यानि शनिवार को महालया है. इस दिन राजधानी के विभिन्न बांग्ला मंडपो से सुबह महालया का पाठ होगा. बांग्ला पंचाग के मुताबिक इस बार का मां का आगमन और विदाई घोड़ा पर हो रहा है. जिसे शुभ नहीं माना जा रहा है. आगमन और गमन दोनों का फल छत्रभंग है.
अभिजीत मुहूर्त में कलश स्थापना उत्तम
15 अक्टूबर यानि जिस दिन शरदीय नवरात्र की शुरुआत हो रही है. इस दिन 11.55 बजे तक वैधृति योग मिल रहा है. इसी कारण अभिजीत मुहूर्त या 11.55 बजे के बाद कलश की स्थापना का सही समय माना जा रहा है. इधर मिथिला पंचाग की माने तो माता का आगमन हाथी पर हो रहा है. लिहाजा, ये एक शुभ संकेत है, जिसमे बारिश की संभावना जताई गई है. कलश स्थापना के लिए सूर्योदय के बाद का समय सही बताया गया है. हालांकि, दिन के 10.30 से 1.30 बजे तक अधपहरा है. इस कारण 10.30 से पहले या दोपहर 1.30 के बाद कलश की स्थापना करना अति माना गया है.
नवरात्रि में नौ दिनों में नौ देवियों की होती है पूजा
हर वर्ष दो बार चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा की विधि विधान से पूजा-अर्चना की जाती है. हालांकि इस दौरान गुप्त नवरात्रि भी आती है. लेकिन, चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि की लोक मान्यता कही ज्यादा है. मा जगदम्बे को समर्पित यह 9 दिन बेहद कल्याणकारी माने जाते है. नवरात्र में माता के दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा अलग-अलग विधि-विधान से की जाती है. जिसमे पहले दिन शैलपुत्री, दूसरे दिन ब्रहमचारिणी, तीसरे दिन चंद्रघंटा, चौथे दिन कुष्मांडा, पांचवे दिन स्कंधमाता, छठे दिन कात्याणी,सांतवे दिन कालरात्री,आठंवे दिन महागौरी और नौवे दिन नवदुर्गा की पूजा की जाती है.
मां जगदम्बा की महिमा अपरंपार है,नवरात्र में जो माता का भक्त सच्चे दिल से नियम पालन करके मां की पूजा करता है. मां उसकी सब मुरादे पूरी करती है. दुर्गापूजा बंगाल में तो विशेषतौर पर मनाई जाती है. इसके साथ ही बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश औऱ गुजरात में भी दुर्गापूजा बेहद धूम-धाम से लोग मनाते हैं.
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