देवघर (DEOGHAR): बसंत पंचमी विद्या की देवी माँ सरस्वती की पूजा अर्चना के रूप में मनाया जाता है. देश भर में जहां एक ओर सरस्वती पूजा की धूम मची है वही बाबानगरी देवघर में आज बाबा बैद्यनाथ का तिलकोत्सव के रुप में मनाया जा रहा है. परंपरा के अनुसार तिलक का रस्म अदा करने बड़ी संख्या में मिथिलांचल वासी बाबाधाम पहुँचे है. बसंत पंचमी के दिन अहले सुबह से ही बाबा मंदिर में मिथलांचल वासी बड़ी बड़ी कांवर लेकर पहुँचते है और बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक कर तिलकोत्सव मनाते हैं.
बसंत पंचमी के दिन महादेव का हुआ था तिलक इसलिए मिथिला वासी आज भोलेनाथ का तिलक का रस्म अदा करते है
प्रत्येक वर्ष बसंत पंचमी के दिन बाबा मंदिर का नज़ारा सावन के दिनों जैसा हो जाता है.खासकर पूरा मंदिर मिथिला वासियों से पट जाता है।मिथला वासी की माने तो बसंत पंचमी के दिन महादेव का तिलक हुआ था. माँ जानकी की नगरी से होने के कारण मिथला वासी अपने को बाबा का संबंधी मानते है इसी नाते आज के दिन बाबा के तिलकोत्सव में शामिल होने देवघर आते है और बाबा का जलाभिषेक कर शिव बारात में शामिल होने का न्योता देते है. एक दूसरे को बधाई देते है और शिवरात्रि के अवसर पर शिव विवाह में शामिल होने का संकल्प लेकर वापस लौट जाते है.
विशेष प्रकार के कांवर, वेश भूषा और भाषा होती है मिथलांचल की पहचान
बिहार के सुल्तानगंज स्थित उत्तर वाहिनी गंगा से जल लेकर बड़ी बड़ी कांवर लेकर मिथिला वासी देवघर पहुँचते है. वेश भूषा,भाषा और बड़ी कांवर ही मिथला वासियों की पहचान होती है. कई टोलियों में आये ये मिथिला वासी शहर के विभिन्न खाली मैदान में इकट्ठा होते है और बड़ी श्रद्धा से पूजा पाठ,पारंपरिक भजन कीर्तन कर आज के दिन बाबा का तिलकोत्सव मनाते है.
तीर्थ पुरोहित भी मानते है कि यह परंपरा अति प्राचीन है
पवित्र द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक बाबा बैद्यनाथ धाम के तीर्थ पुरोहित पंडित दिवाकर मिश्रा की माने तो बसंत पंचमी के अवसर पर मिथिलांचल के लोगों द्वारा महादेव को तिलक चढ़ाने की अति प्राचीन परंपरा चली आ रही है. उस काल से आज तक ये परंपरा मिथला के लोग निभा रहे हैं. इनकी माने तो हिमालय पुत्री माँ पार्वती के विवाह में शामिल होने का निमंत्रण देते है और आज से ही इनलोगों का महाशिवरात्रि की शुरुआत हो जाती है.
रिपोर्ट: रितुराज सिन्हा
