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एक न्यायाधीश का संघर्ष लाया था रंग, जिसने झारखंड आंदोलन की लौ जलाये रखी थी, जानिए कौन थे जस्टिस एलपीएन शाहदेव 

एक न्यायाधीश का संघर्ष लाया था रंग, जिसने झारखंड आंदोलन की लौ जलाये रखी थी, जानिए कौन थे जस्टिस एलपीएन शाहदेव 

Tnp desk:- झारखंड के वजूद में आए दो दशक से ज्यादा का वक्त हो गया है. लेकिन, इसे अलग राज्य बनाने की लड़ाई में, कईयो ने कुर्बानियां और खून बहाया. तब लंबे आंदोलन, संघर्ष और दिन-रात की मेहनत के बाद अलग जल,जंगल जमीन का प्रदेश झारखंड बना. 
इसी झारखंड आंदोलन में शरीक एक जस्टिस भी थे, एलपीएन शाहदेव, जिनकी आज 12वीं पुण्यतिथि है. जिन्हें हर कोई याद कर रहा है और उनकी बताए मार्ग को अपना रहा है. दिवंगत एलपीएन शहदेव,  जो इस प्रदेश के आदिवासी-मूलवासी समुदाय के पहले जज थे. जिन्हें उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने का गौरव हासिल हुआ था. न्यायिक सेवा में भी उन्होंने बड़ी शालीनता और साफगोई से आपना काम किया. इससे अलग हटकर , उन्होंने झारखंड के अलग राज्य बनाने के लिए भी महत्वपूर्ण किरदार अदा किया. आंदोलन की आग जलाकर और लोगों को एकजुट करके इसकी अगुवाई करते रहें और आवाज बुलंद रखा . नतीजा ये रहा कि काफी लंबे अरसे की तपस्या और संघर्ष के बाद झारखंड का निर्माण हुआ. 

अलग राज्य की लड़ाई में निभाया अहम किरदार 

1998 में अलग झारखंड राज्य की लड़ाई चरम पर पहुंच गई थी. बिहार से अलग इसे बनना था, उस दौरान लालू यादव बोला करते थे कि उनकी लाश पर झारखंड बनेगा. इस तरह की बाते उस वक्त फिंजा में तेरने से लोगों के मन में काफी गुस्सा पनप रहा था. झारखंड मुक्ति मोर्चा समेत 16 दल इसकी लड़ाई के लिए  बिगुल फूंका था. उस दौरान सभी ने सर्वसम्मति से आंदोलन की बागडोर जस्टिस एलपीएन शहदेव को सौंपी थी. इस दौरान उनकी नेतृत्व और जोश भरने के अंदाज से अलग राज्य का आंदोलन परवान पर चढ़ा था. उनके अगुवाई से युवाओं में गजब का उत्साह का उन्माद हुआ था. जिससे बिहार और केन्द सरकार की जड़े हिल गई थी.21 सितंबर को सर्वदलीय अलग राज्य निर्माण समिति की बंद से काफी असर हुआ था. हुकमतों को अहसास हो गया था कि ज्यादा दिन तक इनकी मांगों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. हालांकि, इस ऐतिहासिक बंद के दौरान जस्टिस शहदेव को घंटों हिरासत में रखा गया. यह देश की पहली घटना थी कि , जब हाईकोर्ट के किसी पूर्व जज को जानआंदोलन में हिरासत में रखा गया हो. उनका नेतृत्व, संघर्ष और अलग राज्य को लेकर जुनून रंग लाया . जिसका नतीजा रहा है कि झारखंड वजूद में आया. 

भूमिपुत्रों के हक की लड़ाई 

अलग झारखंड के बनने बाद भी आदिवासियों-मूलवासियों के लेकर काम करते रहते थे. उनके हक की आवाज बुलंद रखते थे. उनकी चिंता यही रहती थी कि झारखंड के मूलवासियों को उनके हक को माराकर उनके साथ अन्याय किया जा रहा है. उनके साथ नाइंसाफी की जा रही है. बाहर के लोगों के द्वारा की जा रही हकमारी को लेकर अक्सर गोष्ठियों और चर्चाओं में बोला करते थे. उनका साफ मानना था कि भूमि पुत्रों को उनका हक मिलना चाहिए, क्योंकि इसके असली हकदार वहीं हैं. 
जस्टिस शहदेव चाहते तो आराम से रिटायर होने के बाद अपनी जिंदगी  से गुजार सकते थे. सेवानिवृति के साथ ही किसी आयोग या कमीशन  के अध्यक्ष बन सकते थे . लेकिन, एक जुझारु इंसान की तरह हमेशा आखिर सांस तक संघर्ष का ही रास्ता चुना. बेशक आज दुनिया में  जस्टिस शहदेव नहीं है, लेकिन, उनके बताए रास्ते, उनका  संघर्ष और जिंदगी क्या है. ये सीखा कर चले गये .

रिपोर्ट-शिवपूजन सिंह  

 

Published at:10 Jan 2024 05:00 PM (IST)
Tags:Justice LPN Shahdevdeath anniversary of justice lpn shahdevjustice lpn shahdev ontribution in jharkhandjharkhand movment justice LPN Shadev
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