✕
  • News Update
  • Trending
  • Jharkhand
  • Bihar
  • Politics
  • Business
  • Sports
  • National
  • Crime Post
  • Life Style
  • Health Post
  • Foodly Post
  • TNP Special Stories
  • Big Stories
  • Know your Neta ji
  • Entertainment
  • Know Your MLA
  • Art & Culture
  • Tour & Travel
  • Local News
  • Special Stories
  • TNP Photo
  • Techno Post
  • covid -19
  • LS Election 2024
  • TNP Explainer
  • International
  • Blogs
  • Education & Job
  • Special Story
  • Religion
  • Top News
  • Latest News
  • Lok Sabha Chunav 2024
  • YouTube
☰
  1. Home
  2. /
  3. News Update

झारखंड के इन वीरों की कहानी देशभक्ति के जज़्बे से कर देगी लबरेज़

BY -
Samiksha Singh
Samiksha Singh
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 13, 2026, 3:36:21 AM

रांची(RANCHI):  गुलामी ऐसा कलंक है, जिसका असर आपके हर काम पर पड़ता है। आपके आत्मविश्वास को कुंठित कर देता है, यही सबब है कि इसके विरुद्ध व्यक्ति की अकुलाहट हिंसा करने से भी परहेज़ नहीं करती है. देश जब अंग्रेजों की परतंत्रता के जाल में फंसा था तो इसके खिलाफ संबसे पहले झारखंड के वीरों ने बिगुल फूंका था. यह 30 जून 1855 की बात है. इसके नायक थे सिदो और कान्हो. संथाली भाषा में इस क्रांति को हूल कहा जाता है. यह  झारखंड के एक छोटे से गांव भोगनाडीह से शुरू हुआ था. कहा जाता है कि इसमें करीब दस हजार आदिवासियों ने अपनी आहुति दी थी. आज जब देश अपना 76वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है. चलिये हम आपको झारखंड के ऐसे वीरों के बारे में बताएंगे जिनका देश की आजादी में महत्वपूर्ण योगदान रहा है. 

 

सिदो-कान्हू 

सिदो-कान्हू दो भाई थे. जो संथाल हूल विद्रोह के नायक माने जाते थे. उन्होंने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ हथियार उठाकर मुहतोड़ जबाव दिया था. इन्होने संथाल विद्रोह  में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. 1855 -56 में इन्होंने अंग्रेजी सत्ता, साहूकार, व्यापारियों के खिलाफ एक आंदोलन की शुरुआत की थी. जिसे हूल आंदोलन के नाम से जाना गया. भारी विद्रोह के बाद इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और पेड़ से लटककर फांसी दे दी गयी थी. 

बिरसा मुंडा 

कौन धरती आबा को नहीं जानता. जिन्हें भगवान का दर्जा हासिल है यानी बिरसा मुंडा. इनका जन्म 15 नवम्बर 1875 को रांची जिले के खूंटी अनुमंडल तमाड़ थाना के उलिहातू गांव में हुआ था. वे  झारखंड के आदिवासी-मूलवासियों के नायक हैं . आदिवासी के हितों के लिए उन्होंने ब्रिटिश शासन से लोहा लिया था. अंतिम सांस तक वे अंग्रेजों से अधिकारों की लड़ाई लड़ते रहे. अंग्रेजों के खिलाफ आंदोदन करने पर ये कई बार जेल भी गए थे लेकिन इसके बाद भी न तो उनका सफर थमा और न ही अधिकारों की लड़ाई रुकी. बिरसा और उनके समर्थकों ने तीर कमान से ही अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी और उसे जीता भी.  संदिग्ध स्थिति में उनकी मौत रांची जेल में हो गई थी.

शेख भिखारी 

शेख भिखारी का जन्म 1819 ई. में ओरमांझी थाना के ग्राम खूदिआ (खोदया) में हुआ था. इनके पिता का नाम शेख पहलवान था. 1857 में चुटूपालू की सेना ने रांची नगर पर अधिकार स्थापित कर लिया था. तब इन्होंने रामगढ़ के चुटुपल घाटी घाटी में ब्रिटिश सेना से युद्ध किया था. इसके बाद 1858 में चुटुपाल घाटी में अंग्रेजों ने इन्हें टिकैत उमराव सिंह के साथ बरगद पेड़ में फांसी दे दिया था. 

 

पांडेय गणपत राय 

पांडेय गणपत राय का जन्म 17 जनवरी 1809 को लोहरदग्गा के भैरो गांव में हुआ था. ये जमींदार परिवार से ताल्लुक रखते थे. इनके पिता पिता का नाम किशुन राय श्रीवास्तव था. गणपत राय ने चतरा की लड़ाई में अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध किया था. मगर इस लड़ाई में उन्हें चतरा से भागना पड़ा. बाद में इन्होंने लोहरदगा के जंगलों से छापामार युद्ध जारी रखा. लेकिन इसके बाद गणपत राय को गिरफ्तार कर लिया गया. बाद में गणपत राय को 21 अप्रैल 1818 को राज्य जिला स्कूल के मुख्य द्वार पर कदंब के पेड़ से लटका कर फांसी दे दिया गया. 

विश्वनाथ शाहदेव

इनका जन्म नागवंशी परिवार में 12 अगस्त 1987 को हुआ था. बड़कागढ़ की राजधानी शतरंजी में जन्मे विश्वनाथ शाहदेव बड़कागढ़ के महाराजा बने.  इनके पिता रघुनाथ शाहदेव था. जब वे राजा बने तो इन्हें पता चला कि वास्तविक शक्ति तो अंग्रेजों के हाथ में है. तब उन्होंने अपनी शक्ति को बढ़ाना शुरू किया. उन्होंने अपनी प्रजा को अंग्रेजों के जुल्म से बचाने के लिए तलवार उठाई. विश्वनाथ शाहदेव ने 1855 में बिगुल फूंका और अपने राज्य को अंग्रेजों से स्वतंत्र घोषित कर दिया. 

नीलांबर-पीतांबर

नीलांबर-पीतांबर

शहीद नीलांबर-पीतांबर देश की आजादी के लिए पहली क्रांति के दौरान अपनी विरता से अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे. दोनों भाई के नेतृत्व में काफी संख्या में ग्रामीण अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे. इन लोगों के आंदोलन ने अंग्रेज सरकार को काफी क्षति पहुंचाई थी. 28 मार्च 1859 काे लेस्लीगंज में इन्हें अंग्रेजों ने फांसी दे दी. 

 

 

शहीद हुए थे 10 हजार से ज्यादा संथाल आदिवा

Tags:News

© Copyrights 2023 CH9 Internet Media Pvt. Ltd. All rights reserved.