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विकास के लिए तरस रहे बाक्साइड उगलने वाले गुमला के लोग!आज तक मूलभूत सुविधाएं भी नहीं हुई नसीब

विकास के लिए तरस रहे बाक्साइड उगलने वाले गुमला के लोग!आज तक मूलभूत सुविधाएं भी नहीं हुई नसीब

गुमला(GUMLA):गुमला जिला के कई इलाकों में साठ साल से अधिक समय से बाक्साइड का उत्खन्न हो रहा है लेकिन बावजूद इसके उस इलाके में रहने वाले लोगो का जीवन स्तर सही नहीं हो पाया है. इलाके में विशेष सुविधा की बात तो छोड़ दीजिए,इलाके के लोगों को आज तक मूलभूत सुविधा भी नहीं मिल पाई है.जिसको लेकर कोई भी प्रशासनिक पदाधिकारी कार्रवाई करता हुआ नजर नहीं आ रहा है जो काफी चिंता की बात है.

गुमला पर केवल राजनीति की गई है विकास नहीं

झारखंड देश का एक ऐसा राज्य है जहां 40 प्रतिशत खनिज संपदा मौजूद है. बावजूद इसके गुमला जिला के दूर दराज के ग्रामीण क्षेत्रो का सही रूप से विकास नहीं हो सका है. इसके लिए कोई एक राजनीतिक दल नहीं बल्कि झारखंड में सक्रिय सभी राजनीतिक दल जिम्मेवार है. जिन्होंने कभी इसको लेकर सही रूप से ध्यान नहीं दिया. हम बात गुमला जैसे आदिवासी बहुल जिले की कर रहे हैं जहां के कई इलाकों में बाक्साइड का उत्खनन आजादी के पूर्व से ही किया जा रहा है लेकिन आज भी उन इलाकों की तस्वीर को देखकर आज भी काफी दर्द होता है. इलाके में रहने वाले आदिवासियों में काफी संख्या आदिम जनजाति के लोगो की है बावजूद इसके जो तस्वीर है वह बहुत कुछ कहने को मजबूर करता है.

आज तक मूलभूत सुविधाएं भी नहीं हुई नसीब

स्थानीय समाजिक कार्यकर्ता मंगरा उरांव की माने तो उन लोगो को पूरा उम्मीद थी कि बाक्साइड के खान यहां होने के कारण इस इलाके का काफी विकास होगा,लेकिन आज तक इस दिशा में कोई काम नहीं हो पाया. जिसकी वजह से बाक्साइड का उत्खनन करने वाली हिंडाल्को जैसी कंपनी तो अरबो रुपया कमा ली लेकिन उस इलाके में रहने वालों को आज तक सही रूप से बिजली पानी सड़क शिक्षा और स्वस्थ की सुविधा नहीं मिल पाई है. उल्टा वहां के लोगो टीबी जैसी कई ख़तरनाक बीमारी की चपेट में आकर समय से पहले मौत का शिकार हो जाते है.

बॉक्साइट के खेल में प्रशासन के लोग भी शामिल होते हैं

ग्रामीणो की माने तो बाक्साइड के अबैध उत्खन्न के खेल में प्रशासनिक से लेकर जिला के नेता भी पूरी तरह से शामिल है.उन्होंने कहा कि यहां के लोगो का दर्द केवल विपक्ष में रहने वाली पार्टियों को सुनाई देती है लेकिन जैसे ही वे भी सत्ता में आते है वे भी उस खेल की मलाई खाने में लग जाते है. जिला का विधानसभा व लोकसभा का सीट आरक्षित सीट है. जहां से आदिवासी समाज का व्यक्ति जीतकर लोकसभा और विधानसभा में जाता है लेकिन वह भी जीतने के पूर्व तो इसे मुद्दा बनाता है लेकिन जीतने के बाद मलाई खाने में लग जाता है जिसका परिणाम है कि यहां से बाक्साइड का उत्खनन करने वाले दर्जनों लोग अरबो रुपया कमा लिए लेकिन इस जमीन के मालिक उस आदिवासी व आदिम जनजाति की स्थिति आज भी दयनीय बनी हुई है.

 केन्द्र की ओर से डीएमएफटी के फण्ड में जमा करवाने की व्यवस्था भी कराई गई है 

केंद्र सरकार की ओर से इन इलाकों के विकास को लेकर इस इलाके में होने वाले उत्खनन के लाभांश को जिला स्तर पर बनी डीएमएफटी के फण्ड में जमा करवाने की व्यवस्था भी कराई गई है लेकिन उसका भी सही रूप से लाभ इन इलाके के लोगों को नहीं मिल पाता है. जबकि जिला के प्रशासनिक पदाधिकारी का मानना है कि डीएमएफटी फण्ड की राशि से इन इलाकों में सड़क बिजली पानी शिक्षा व स्वस्थ की सुविधा बहाल कराई जा रही है. प्रशासनिक पदाधिकारी कोई भी दावा कर ले लेकिन जमीनी सच्चाई को देखकर कुछ खास बताने की आवश्यकता नहीं है जिसके लिये केंद्र और राज्य सरकार के साथ ही स्थानीय सांसद विधायक व जिला प्रशासन के पदाधिकारी सीधे तौर पर जिम्मेवार है.यही कारण है कि कई बार यह सुनने को मिलता है कि झारखंड एक अमीर राज्य है लेकिन यहां रहने वाले लोग गरीब है.

रिपोर्ट-सुशील कुमार

Published at:31 Aug 2024 04:43 PM (IST)
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