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मोहम्मदगंज के काशीस्रोत डैम का प्रकृति प्रदत्त गुफा बना आस्था और आकर्षण का केंद्र

मोहम्मदगंज के काशीस्रोत डैम का प्रकृति प्रदत्त गुफा बना आस्था और आकर्षण का केंद्र

पलामू (PALAMU):  मोहम्मदगंज अंतर्गत गोड़ाडीह पंचायत के बटउवा गांव के पास स्थित काशीस्रोत डैम के दक्षिण दिशा में पहाड़ी पर अवस्थित गुफा डैम के साथ ही लोगों के लिए आस्था और आकर्षण का केंद्र है. जिसे छोटका पड़वा बाबा के रूप में काफी पहले से प्रसिद्धि प्राप्त है. वहां पहुंचने के लिए डैम के बगल से पगडंडी लगभग 500 मीटर आगे बढ़ने पर एक सपाट पहाड़ी है. जिसे पड़वा बाबा के आंगन के तौर पर मान्यता प्राप्त है. इसी पहाड़ी की 200 फीट ऊपर की चढ़ाई के बाद वह गुफा दिखाई देती है. जिसका मुहाने की चौड़ाई 8 फीट और अंदर की ओर लंबाई 20 फीट है. जबकि ऊंचाई लगभग ढाई फीट है. इस गुफा में स्वयंभू रूप में 3 पिंड मौजूद हैं. जिन्हें स्थानीय ग्रामीण और किसान "पहड़वा बाबा" के अलावा पड़वा बाबा के नाम पर फसलों के तैयार होते ही उन्हें उसका कुछ अंश अर्पित करते हैं. किसान लखन यादव के अनुसार मिट्टी की कड़ाही में वहीं पुआ पकवान बनाकर चढावा चढ़ाया जाता हैं. वर्षों पहले इस गुफा में लोग झुककर प्रवेश कर जाते थे. मगर अब धीरे-धीरे धंसता हुआ इसके मुहाने की ऊंचाई मात्र ढाई फीट संकरा रह गई है. इस गुफा और पिंड के आस-पास की पहाड़ियों के मनमोहक नयनाभिराम प्राकृतिक सौंदर्य दीदार मंत्रमुग्ध कर देने वाला है. स्थानीय युवाओं की टोली ने वहां पहुंचकर खूबसूरत पलों को कैमरे में कैद किया. उन्होंने कहा कि इस गुफा और काशीस्रोत डैम का पर्यटन के दृष्टिकोण से विकास की अपार संभावनाएं मौजूद हैं. यहां पहुंचने के लिए काशीस्रोत डैम के रास्ते का सहारा लिया जा सकता है. इन युवाओं में मनीष कुमार सिंह, अजीत कुमार सिंह, मिथुन कुमार सिंह, अभिषेक मेहता, अभिषेक शानू चौरसिया शामिल थे.

पांडव पुत्रों ने लिया था गुफा में शरण

जैसा की किंवदंतियों में कहा गया है कि अज्ञातवास में पांडव पुत्रों ने इस क्षेत्र में भी शरण लिया था. इसी को लेकर ऐतिहासिक भीमचुल्हा को प्रसिद्धी मिली है. संभव है कि पांडव पुत्रों ने इस गुफा में भी शरण लिया होगा. जिसकी वजह से इस गुफा और स्थान को पंडवा के रूप में जाना जाता है.

प्रकृति की अनमोल देन है ये गुफाएं - आर्कोलाजिस्ट डा. अभिषेक

प्रकृति की अनमोल देन हैं इस क्षेत्र की ऐसी गुफाएं. जो कभी जंगली जानवरों के आश्रयणी के रूप में, तो कभी मनुष्यों के विश्राम गृह के तौर पर भी. इस क्षेत्र में ऐसी कई प्राकृतिक गुफाएं मौजूद हैं. ऐसा माना जाता है कि ये गुफाएं पाषाण युग में यानि आज से करीब 50 हजार वर्ष पहले आदिम मानव भी इस्तेमाल किया करते थे. ऐसी कई गुफाओं के उदाहरण मिलते रहे हैं, जहां से पाषाण युग के औजार प्राप्त हुए हैं. साथ ही साथ इनके आस-पास से प्रागैतिहासिक काल के मानवों द्वारा बनाये गए चित्र भी देखे गए हैं. इसी क्षेत्र से एक ऐसी गुफा प्राप्त हुई है, जिसके अंदर प्रागेतिहासिक काल के चित्र बने हुए हैं. जो लाल रंग के है. ये प्राकृतिक गुफा ग्रेनाइट पत्थरों से बनी हुई है. अतः सरकार को इस प्राकृतिक प्रदत्त ऐसी गुफाओं को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करना चाहिए.

रिपोर्ट: जफर हुसैन, पलामू

Published at:05 Aug 2022 01:10 PM (IST)
Tags:News
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