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रसीद नम्बर 69 का रहस्य: क्या दुमका में लुट गई सरकारी योजना

BY -
Vinita Choubey  CE
Vinita Choubey CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 18, 2026, 8:47:07 AM

दुमका (DUMKA) : भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है. आंकड़े बताते हैं कि देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में कृषि का योगदान लगभग 17 प्रतिशत है, जबकि 50 प्रतिशत से अधिक आबादी को रोजगार कृषि क्षेत्र से मिलता है. केंद्र और राज्य सरकारें किसानों की आय बढ़ाने के लिए योजनाओं की झड़ी लगाए रहती हैं. उद्देश्य एक ही है किसानों की आर्थिक उन्नति.

78 साल बाद भी सवाल वही: किसान सबसे कमजोर कड़ी?

आजादी के 78 वर्ष बाद भी किसान हर मौसम में सरकार की ओर टकटकी लगाए रहता है. आखिर क्यों? इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए The News Post झारखंड सरकार की एक अहम योजना की जमीनी पड़ताल कर रहा है, जहां कागजों पर सब कुछ सही, लेकिन हकीकत में तस्वीर डरावनी नजर आ रही है.

50% अनुदान वाली रबी बीज योजना: कागजों में नेक, जमीन पर खेल?

हम बात कर रहे हैं कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग कि बीज विनिमय वितरण योजना की. इस योजना के तहत दुमका जिले को गेहूं, सरसों, चना और मसूर का बीज 50 प्रतिशत अनुदान पर उपलब्ध कराया गया. लेकिन यह बीज किसान तक नहीं बल्कि जिसके हाथ आया वही किसान बन गया.

जिला कृषि पदाधिकारी के पत्र में नियम साफ, लेकिन पालन नदारद

जिला कृषि पदाधिकारी के हस्ताक्षर से जारी पत्र में स्पष्ट निर्देश दिए गए कि बीज केवल निबंधित किसानों को कृषि योग्य भूमि के दस्तावेज के आधार पर जमीन के रकबे के अनुरूप दिया जाएगा लेकिन इसका अनुपालन कितना हुआ जानकर आप हैरान हो जाएंगे. विभाग द्वारा बीज वितरण के लिए लैंप्स और निजी निबंधित विक्रेता को उपलब्ध कराया गया. लेकिन नियमों की इस किताब को किसने फाड़ दिया? जवाब एक रसीद देती है.

रसीद नंबर 69: घोटाले की पहली ठोस गवाही

सिंदरी फर्टिलाइजर स्टोर द्वारा जारी रसीद संख्या 69 इस पूरे खेल की पोल खोल देती है. यह सिर्फ कागज का टुकड़ा नहीं बल्कि यूं कहें कि बीज घोटाले की लिखित स्वीकारोक्ति है. बीज खरीदने वाले की सच्चाई जानकर यह समझना मुश्किल नहीं कि दुमका में किसान क्यों बदहाल है.

जब पत्रकार बना फर्जी ‘किसान’: आधार कार्ड बना जादुई चाबी

सच्चाई परखने के लिए हमारे एक पत्रकार साथी (नाम गोपनीय) ने सिर्फ आधार कार्ड लेकर कतार में लगने का फैसला किया. न जमीन का कागज और न किसान पंजीकरण. फिर भी मिला 80 किलो ग्राम गेहूं और 60 किलो चना का बीज वह भी सरकारी दर पर. मोबाइल नंबर पर ओटीपी वेरिफिकेशन से लेकर बीज के पैकेट के साथ फोटो खिंचवाना भी अनिवार्य किया गया लेकिन जमीन संबंधी दस्तावेज की मांग तक नहीं की गई.

यह सिर्फ बानगी नहीं, बड़े घोटाले का ट्रेलर है

अगर एक आम व्यक्ति सिर्फ आधार कार्ड के सहारे इतना बीज उठा सकता है, तो सोचिए पूरे जिले में क्या खेल हुआ होगा? अगर निष्पक्ष जांच हुई, तो बीज घोटाले की परत दर परत खुलेंगी.

कम जमीन, कम सिंचाई फिर इतना बीज क्यों?

दुमका की हकीकत किसी से छिपी नहीं है. यहां कृषि योग्य भूमि सीमित है.  सिंचाई सुविधा बेहद कमजोर है. रबी खेती नाममात्र की होती है. यही वजह है कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए हमेशा हाथों में तीर धनुष लेकर खड़े रहने वाले लोग भी कृषि के नाम पर अपना मुंह मोड़ लेते है. तभी तो विभाग को लाभुकों तक योजना का लाभ पहुंचाने के लिए कई स्तर पर प्रचार प्रसार करना पड़ता है. रबी फसल के बोआई का समय बीत रहा है फिर भी काफी मात्रा में बीज वितरण के लिए रखा हुआ है.

तीन एजेंसियां, एक ही खेल, The News Post खोलेगा सबकी पोल

कृषि विभाग द्वारा बीज वितरण की जिम्मेदारी लैंप्स के साथ साथ तीन निजी एजेंसियों को दी गई जिनके नाम सिंदरी फर्टिलाइजर,  प्रोग्रेसिव विजन और मेसर्स विकास इंटरप्राइजेज है. आज हम आपको सिंदरी फर्टिलाइजर्स स्टोर की करतूत बता रहे है. जिस पर आरोप है कि नियमों को रौंदकर सरकारी योजना को मजाक बना दिया. आने वाले समय में लैंप्स के साथ अन्य एजेंसी के क्रिया कलाप की पड़ताल करेंगे.

कृषि विभाग की भूमिका संदिग्ध: लापरवाही या मिलीभगत!

नियम कहता है कि बीज सिर्फ उसी को मिलेगा जो किसान हो और जिसके पास कृषि योग्य जमीन हो. तो फिर यह कैसे हुआ? क्या कृषि विभाग ने आंख मूंदकर पूरा सिस्टम निजी एजेंसियों के हवाले कर दिया? या फिर यह सरकारी अनुदान की संगठित लूट है?

जिला कृषि पदाधिकारी ने दिया जांच का भरोसा

जिला कृषि पदाधिकारी निशा कुल्लू ने स्वीकार किया कि सिर्फ आधार कार्ड पर बीज देना नियमों का उल्लंघन है. उन्होंने पूरे मामले की जांच कर कार्रवाई की बात कही है.

बीज वितरण या सरकारी योजना का चीरहरण!

दुमका में यह बीज वितरण नहीं, बल्कि सरकारी योजना का खुलेआम चीरहरण प्रतीत होता है.अब देखना यह है कि दोषियों पर सख्त कार्रवाई होती है या मामला एक बार फिर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है. अगर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह साफ संकेत होगा कि घोटालेबाजों को सिस्टम का खुला संरक्षण हासिल है.

रिपोर्ट-पंचम झा

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