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माओवादियों और सुरक्षा बलों के हिंसा के बीच पिस रही मूलवासी आदिवासियों की जिंदगी, सरकार से सुरक्षा की कर रहे हैं मांग

BY -
Shreya Gupta
Shreya Gupta
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 13, 2026, 9:15:26 PM

चाईबासा (CHAIBASA) : झारखंड जनाधिकार महासभा ने बुधवार को संलग्न सार्वजनिक अपील जारी कर सभी पक्षों से पश्चिमी सिंहभूम के जंगलों में आदिवासियों पर हो रही हिंसा को रोकने की मांग की है. पिछले कुछ महीनों से पश्चिमी सिंहभूम के सारंडा के वन क्षेत्रों, खास कर सदर, गोईलकेरा और टोंटो प्रखंडों के आदिवासी-मूलवासियों का जीवन उथलपुथल हो गया है. एक तरफ सुरक्षा बलों के अभियान के दौरान हिंसा और दूसरी ओर माओवादियों द्वारा हिंसा. इसके बीच निर्दोष आदिवासी-मूलवासी फंसे हुए हैं. बिना ग्राम सभा की सहमति के सुरक्षा बलों के कैंप बैठाए जा रहे हैं. जो पांचवी अनुसूची प्रावधानों और पेसा का खुला उल्लंघन है. गावों में डर और दमन का माहौल है. सुरक्षा बलों एवं माओवादियों की आपसी लड़ाई के डर से आदिवासी अपने जंगल भी नहीं जा पा रहे हैं, जो उनके लिए जीवनरेखा समान है.

यौन शोषण का भी बना रहता है डर

हाल के दिनों में, शाम होते ही सुरक्षा बलों द्वारा गावों की दिशा में गोलीबारी और मोर्टार दागे जा रहे हैं. दूसरी ओर माओवादियों द्वारा जवाबी कार्यवाई का डर. गांव के युवा, बच्चे, बुज़ुर्ग और महिलाएं, सब दहशत में हैं. अभियान के दौरान यौन शोषण के डर से महिलाएं अपने घर में ही असुरक्षित महसूस कर रही हैं.  कई गावों में बिना सहमति के कैंप स्थापित होने के बाद गांव-समाज में फूट पड़ रही है. गांव का माहौल बिगड़ रहा है. कैंप के आसपास विदेशी शराब गैर-कानूनी तरीके से बीकने लगा है. आदिवासी अपनी परंपरा अनुसार न पूजा कर पा रहे हैं और न जी पा रहे हैं. गैर-आदिवासी और बाहरी सुरक्षा बल की उपस्थिति से गांव में तनाव का माहौल है. अपने समाज मे हो रहे शोषण-अत्याचार के विरोध में अपनी प्रतिक्रिया देने वाले आम ग्रामीणों  को माओवादियों के समर्थक के रूप में देखा जा रहा है. सुरक्षा बलों के डर से ग्रामीण अपनी ग्राम सभा तक नहीं कर पा रहे हैं. 

दुखद और चिंतनीय है परिस्थिति 

यह परिस्थिति अत्यंत दुखद और चिंतनीय है. हो आदिवासी सदियों से अपने स्वाभिमान और जल, जंगल, ज़मीन और प्रकृति के साथ खुले मन से जीए हैं. लेकिन आज वे अपने ही क्षेत्र में कैदी जैसा जी रहे हैं. माओवादियों द्वारा किए गए हिंसा की घटना में निर्दोष आदिवासी युवाओं पर पुलिस द्वारा फ़र्ज़ी मामले डाले जा रहे हैं. बिना वारंट के कई दिनों तक थाना और  कैंप में रखा जा रहे है. ग्रामीण स्थानीय अधिकारीयों और विधायकों से कई बार गुहार लगा चुके हैं.

सुरक्षा बलों की लड़ाई के बीच पिस रहे हैं ग्रामीण

माओवादियों और सुरक्षा बलों के हिंसा के बीच आम ग्रामीण – आदिवासी – पीस रहे हैं. झारखंड जनाधिकार महासभा दोनों पक्षों से अपील करती है कि उनकी लड़ाई में आम ग्रामीणों पर हिंसा न हो और आम ग्रामीणों के जीवन को बर्बाद न किया जाए.  मूलवासी आदिवासियों ने प्रशासन और पुलिस से मांग किया है कि बिना ग्राम सभा की सहमति के सुरक्षा बलों के कैंप न लगाए जाएं और मात्र संदेह के आधार पर या माओवादियों को खाना खिलाने के कारण आदिवासी युवाओं को माओवादी हिंसा मामले में फ़र्ज़ी रूप से न जोड़ा जाए. हम अपील करते हैं कि पुलिस और प्रशासन संवैधानिक, क़ानूनी दायरे में अपनी कार्यवाई करे. राज्य सरकार से भी मांग करते हैं कि तुरंत ज़िला व अन्य आदिवासी क्षेत्रों में पांचवी अनुसूची प्रावधानों व पेसा को कड़ाई से लागू करें. इतिहास गवाह है कि दोनों पक्षों की ऐसी कार्यवाई के बाद धीरे-धीरे आदिवासियों से उनकी ज़मीन और जंगल छीन ली जाती है और आदिवासी अपने ही क्षेत्र में जिन्दा लाश की तरह जीते हैं.

सांसद से अपील

झारखंड जनाधिकार महासभा ने स्थानीय विधायकों और सांसद से अपील की है कि स्थिति को सामान्य बनाने और इन क्षेत्रों के आदिवासियों के लिए लोकतंत्र को पूर्ण बहाल करने के लिए उचित मार्गदर्शन दें. वे इन गांवों में जाकर, ग्रामीणों से बात कर स्थिति को स्वयं देखने समझने और उन्हें बेबसी और आतंक की स्थिति से उबारने का दायित्व निभायें. मुख्यमंत्री से इन गाँवों के ग्रामीणों से सीधे संवाद कर उन्हें इस स्थिति से मुक्ति दिलाने की विशेष अपेक्षा है. हमें आशा है कि सरकार मामले की गंभीरता को समझते हुए उचित पहल करेगी और क्षेत्र के ग्रामीण आदिवासी-मूलवासी जल्द पहले की तरह खुले मन से अपने जल, जंगल, ज़मीन के साथ खुली हवा में जी पाएंगे.

रिपोर्ट : संतोष वर्मा, चाईबासा

 

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