दुमका (DUMKA): भारत पर्व त्योहार का देश है और पर्व कोई भी हो सामान्य लोगों के लिए खुशियां लेकर आता है. अगर हम बात दीपों के त्योहार दीपावली की करें तो आम लोगों के साथ-साथ एक विशेष समुदाय के लोगों को लिए इस पर्व का खास इंतजार रहता है. वह है कुंभकार. दीपावली में मिट्टी के दीए जलाने की परंपरा सदियों से रही है. इस परंपरा को बनाए रखने के लिए कुंभकार दीपक निर्माण की जिम्मेदारी सदियों से कुंभकार बंधु बखूबी निभाते आ रहे हैं. लेकिन सरकार और प्रशासन इनकी कला को कुछ खास महत्व नहीं देते. यहीं कारण है कि कुंभकार दीपावली के लिए दीए बना तो लेते हैं, लेकिन उसे बेचना एक बड़ी समस्या बनी रहती है. ऐसे में जिले के कुंभकार प्रशासन से एक निर्धारित स्थल करने की मांग कर रहे हैं जहां बैठकर सभी कुंभकार अपने उत्पाद को बेच सकें.
मिट्टी की समस्या का कारण बना शहरीकरण
विगत 2 वर्षों से कोरोना का कहर इस कदर बरपा की दीपावली जैसे त्यौहार पर भी कुंभकार को निराशा ही हाथ लगी लेकिन इस वर्ष जब हालात सामान्य हुए हैं तो उनकी भी उम्मीद जगी है. दिन रात मेहनत कर दुमका के कुंभकार मिट्टी के दीपक बना रहे हैं. ताकि दीपोत्सव पर मिट्टी के दीपक जलाने की परंपरा को आगे बढ़ाया जा सकें. इन्हें उम्मीद है कि इस वर्ष अच्छी आमदनी होगी. लेकिन इनके समक्ष भी समस्या है. सबसे गंभीर समस्या मिट्टी की होती है. पहले शहर के आसपास खाली स्थल था जहां से ये मिट्टी ले आते थे. लेकिन अब शहर का विस्तार होने लगा. खाली जगह पर घर बन गए तो इन्हें शहर से दूर से मिट्टी लाना पड़ता है. जिससे लागत बढ़ती है. वहीं अपने उत्पाद को बेचने के लिए भी इन्हें कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है. उत्पाद लेकर जब गांव से शहर आते हैं तो कहां बैठकर बेचेंगे यह गंभीर समस्या है. अगर सड़क किनारे बैठते हैं तो ट्रैफिक जाम की समस्या उत्पन्न होती है और पुलिस वाले इन्हें वहां से उठा देते हैं. इसके अलावा किसी दुकान के आगे अपनी बाजार लगाते हैं तो दुकानदारों को आपत्ति होती है और इन्हें ऐसा करने नहीं देते. तभी तो जिले के कुंभकार प्रशासन से स्थल निर्धारित करने की मांग कर रहे हैं जहां बैठकर सभी कुंभकार अपने उत्पाद को बेच सकें.
रिपोर्ट: पंचम झा, दुमका
