रांची(RANCHI): होली रंगों का त्योहार है, लेकिन बदलते समय के साथ बाजार में बिकने वाले केमिकलयुक्त रंग और गुलाल लोगों की त्वचा के लिए परेशानी का कारण बन रहे हैं. कई लोगों को इन रंगों से एलर्जी, खुजली और त्वचा संबंधी अन्य समस्याएं हो जाती हैं. यही वजह है कि अब लोग सुरक्षित विकल्प के रूप में हर्बल गुलाल की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं.
इस बदलाव ने ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार का नया रास्ता खोल दिया है. आर्थिक रूप से कमजोर महिलाएं हर्बल गुलाल तैयार कर न सिर्फ आत्मनिर्भर बन रही हैं, बल्कि लोकल फॉर वोकल की भावना को भी आगे बढ़ा रही हैं. बसंत पंचमी के बाद जैसे-जैसे होली नजदीक आती है, बाजारों में रंगों की दुकानें सजने लगती हैं. इसी बीच ग्रामीण क्षेत्रों की सखी-दीदियां प्राकृतिक सामग्री से हर्बल गुलाल बनाकर स्टॉल के माध्यम से उसकी बिक्री भी कर रही हैं.
झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी से जुड़ी महिलाओं ने इस बार करीब चार क्विंटल हर्बल गुलाल बेचने का लक्ष्य रखा है. वे पलाश के फूल, गेंदा, पालक, नीम की पत्तियां, अरारोट और सुरक्षित फूड कलर जैसे प्राकृतिक तत्वों का उपयोग कर गुलाल तैयार कर रही हैं. उनकी मेहनत का असर यह है कि शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में इसकी मांग बढ़ रही है.
महिलाएं ग्राहकों को यह भी समझा रही हैं कि उनके उत्पाद में किसी तरह के रसायन का इस्तेमाल नहीं किया गया है. यह गुलाल त्वचा के लिए सुरक्षित, पर्यावरण के अनुकूल और बायोडिग्रेडेबल है, जो पानी में आसानी से घुल जाता है. इससे एलर्जी या दुष्प्रभाव की आशंका नहीं रहती.
जिला प्रशासन भी इन महिलाओं को प्रोत्साहित कर रहा है और हर्बल गुलाल की बिक्री बढ़ाने में सहयोग दे रहा है. चासहाट फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी की सीईओ ऋचा मिश्रा के अनुसार, इस पहल से महिलाओं की आय में वृद्धि हो रही है और वे आत्मनिर्भरता की दिशा में मजबूत कदम बढ़ा रही हैं.
