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अचानक एक गांव के मुसलमान ने बदला टाइटल! शेख लिख रहे दुबे तो पठान बन गए ठाकुर

BY -
Shivani CE
Shivani CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 12, 2026, 4:04:02 PM

टीएनपी डेस्क: भारत में एक ओर जहां मंदिर-मस्जिद विवाद जोरों पर हैं तो वहीं दूसरी तरफ एक ऐसा गांव है जहां मुस्लिम समुदाय अपने नाम के साथ हिन्दू सरनेम लगा रहे हैं. इस गांव में शेख दुबे हो गए हैं तो सिद्दीकी शांडिल्य तो वहीं नौशाद पांडे लगा रहे हैं तो मोहम्मद गुफरान ठाकुर हो गए हैं. जी हां, आपने सही पढ़ा इस गांव के मुसलमान अपने नाम के साथ अब सनातनी गौत्र लगा रहे हैं. इतना ही नहीं, नमाज के साथ-साथ मंदिर में पूजा भी कर रहे हैं और गौ माता की सेवा भी कर रहे हैं. खुशी-खुशी ‘मुस्लिम ब्राह्मण’ बन तिलक भी लगा रहे हैं. अब आप सोच रहे होंगे कि ये किस गांव में हो रहा है और यहां के मुसलमान एक साथ दोनों ही धर्म को क्यों मान रहे हैं. आपको बता दें कि ये अनोखा गांव और कहीं नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश का है.

जौनपुर का डेहरी गांव की है कहानी 

उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में केराकत का एक छोटा सा गांव है डेहरी. जौनपुर का डेहरी गांव अचानक से सुर्खियों में तब आ गया जब इस गांव के ही निवासी नौशाद अहमद ने अपनी बेटी के शादी के कार्ड में अपना नाम नौशाद अहमद की जगह नौशाद अहमद दुबे लिखवाया. जिसके बाद से हर किसी का ध्यान अब इस गांव पर है. लेकिन सिर्फ नौशाद ही नहीं बल्कि यहां कई ऐसे मुसलमान हैं जो अपने नाम के साथ सनातनी गौत्र का इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन आखिर क्यों? ऐसा भी नहीं है कि इन्होंने अपना धर्म परिवर्तन करवा लिया है. ये अपने धर्म के अनुसार नमाज भी पढ़ रहे हैं और पूजा भी कर रहे हैं. ऐसे में सवाल है कि आखिर क्यों यहां के भाईजान अपने नाम के साथ हिन्दू सरनेम लगा रहे हैं.

पूर्वजों के धरोहर को सहेजने की कोशिश 

दरअसल, यहां के मुसलमानों का कहना है कि इनके 7 पीढ़ी पहले के पूर्वज हिन्दू थे. लेकिन इनके बाद की पीढ़ी धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बन गई. ऐसे में जब इन्हें इस बात का पता चला तब से ये अपने पूर्वजों को मान उनकी तरह ही हिन्दू सरनेम लगाने लगे. किसी के पूर्वज ब्राह्मण थे तो वे दुबे लगा रहे हैं तो वहीं किसी के पूर्वज शांडिल्य, पांडे और ठाकुर थे. इसलिए वे अपने पूर्वजों के विरासत को सहेजना चाहते हैं. इनका कहना है कि, हम कौन सा अफगानिस्तान या अरब जगहों से आते हैं. शेख, पठान, मिर्जा ये सब तो उधार के हैं. हम उधार का नाम क्यों लगाएं. अगर हमारे पूर्वज दुबे, पांडेय थे तो वही टाइटल लगाने में क्या दिक्कत है. हम यहीं के हैं और पूर्वज हमारे दुबे, पांडे लगाते थे. अब हम भी लगा रहे हैं. पूर्वजों के धरोहर को सहेज रहे हैं बस.

नमाज के साथ करते हैं पूजा भी 

इस गांव में सिर्फ एक दो नहीं बल्कि 70 से 80 मुसलमानों ने अपने नाम के आगे हिन्दू सरनेम लगा लिया है. यहां के मुसलमान कुरान भी पढ़ रहे हैं मस्जिद जा कर नमाज भी पढ़ रहे हैं और इसके साथ ही भगवान राम को मान रहे हैं मंदिर भी जा रहे हैं और गले में भगवा गमछा लिए गौ माता की सेवा भी कर रहे हैं. इनका कहना है कि भगवान राम तो सबके भगवान है. इनकी पूजा करने में क्या दिक्कत है. ईश्वर में आस्था होनी चाहिए फिर वह किसी भी रूप या किसी भी नाम में आए. हालांकि, अपने नाम के साथ हिन्दू सरनेम का इस्तेमाल अब तक सिर्फ पुरुषों ने ही किया है. इनके परिवार की महिला सदस्य अपने असली नाम का ही इस्तेमाल कर रही हैं और उन्हें इस बात से कोई दिक्कत भी नहीं है कि घर के पुरुष दोनों धर्मों को मान रहे हैं.

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