टीएनपी डेस्क(TNP DESK):देवघर का बाबा मंदिर देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी काफी प्रसिद्ध है. बाबा भोलेनाथ को काशी नगरी के साथ देवघर भी काफी प्रिय है. क्योंकि यहां शिव से शक्ति का मिलन हुआ था. देवघर को लोग बाबा की नगरी के नाम से भी जानते हैं. यहां सावन के पूरे महीने पूरे देश से कांवरिये कांधे पर कांवड लेकर भगवान शंकर को जलार्पण करने पहुंचते हैं. सावन महीने में देवघर की गली-गली भगवे रंग से पट जाती है. लोग अपनी श्रद्धा भक्ति के अनुरुप बाबा के दर पर पहुंचते हैं.
देवघर में हुआ माता शिव-शक्ति का मिलन
देवघर बाबा मंदिर के साथ देश के 51 शक्ति पीठों में से एक स्थान भी है. जहां माता सती का हृदय गिरा था. जिसकी वजह से यहां शिव के साथ माता सती की शक्ति के रुप में पूजा की जाती है. यहां माता के मंदिर के पहले बाबा भोलेनाथ का शिवलिंग स्थापित है. जिसमें हर साल शिवरात्रि के मौके पर भगवान शिव और शक्ति का गठबंधन किया जाता है. और भगवान दुल्हे के रुप में माता पार्वती से विवाह करने धूमधाम से बारात लेकर जाते हैं.
माता सती के हृदय गिरने से बना शक्ति पीठ
देवघर मंदिर के पीछे बहुत सारी धार्मिक कथाएं प्रचलित है. जिसमें एक कथा बहुत ही ज्यादा प्रसिद्ध है. इसके अनुसार माता सती भगवान शिव को बहुत ज्यादा पसंद करती थी. और मन ही मन में उनको अपना पति मान चुकी थी. लेकिन माता सती के पिता राजा दक्ष अपनी पुत्री का विवाह किसी ऐसे पुरुष ने बिल्कुल नहीं करना चाहते थे. जो कैलाश पर्वत पर रहता है. जिसके पास अपना महल तक नहीं है. काफी मिन्नतों के बाद भी जब राजा दक्ष विवाह के लिए राजी नहीं हुए तो माता सती ने अपने पिता के खिलाफ जाकर भगवान शिव से प्रेम विवाह कर लिया.
भगवान बिष्णु ने किया था भोलेनाथ और माता सती को मिलाने का वादा
विवाह के बाद माता सती भगवान शंकर के साथ कैलाश पर्वत पर रहने लगी. एक बार की बात है. राजा दक्ष ने एक यज्ञ की घोषणा की. जिसमें सभी पुत्रियों और उनके पतियों को निमंत्रण तो दिया. लेकिन माता सती और भगवान शंकर को नहीं बुलाया. जब माता सती को इसकी जानकारी मिली. तो उन्होंने भगवान शंकर को इस यज्ञ में लेकर जाने के लिए कहा. भोलेनाथ ने मना किया और समझाया कि बिना बुलाये जाने से अपमान होता है. लेकिन माता सती की जिद्द को देखते हुए माता को जाने की इजाजत तो दे दी. लेकिन भोलेनाथ राजा दक्ष के यज्ञ में शामिल नहीं हुए.
कुल 51 जगहों पर गिरा था माता सती का अंग
जहां जाने के बाद माता सती ने अपने पिता राजा दक्ष से भगवान भोलेनाथ को यज्ञ में निमंत्रण नहीं देने की वजह पूछी. तभी राजा दक्ष ने भगवान भोलेनाथ को अपशब्द कहकर अपमानित किया. माता सती को अपने पति का अपमान बर्दाश्त नहीं हुआ. और क्रोध में आकर माता सती ने हवन कुंड में अपने शरीर त्यागने के लिए कूद पड़ी. और अपने पिता के सामने अपने प्राण त्याग दिये. जब भगवान को ये पता चली तो भगवान शंकर क्रोध में पहुंचे. और अग्निकुंड से माता के जले हुए शव को लेकर तांडव करने लगे. जिसकी वजह से तीनों लोक में प्रलय आ गया. तब सारे देवता मिलकर सृष्टी के रचयिता भगवान बिष्णु की शरण में पहुंचे. और भोलेनाथ के क्रोध को शांत करने का उपाय पूछने लगे.
भगवान बिष्णु ने किया था भोलेनाथ का क्रोध शांत
तब भगवान बिष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के जले शरीर को काट-काटकर धरती पर गिराने लगे. कुल 51 जगहों पर माता सती के अंग गिरे. जो आज शक्ति पीठ के रुप में देश में प्रसिद्ध है. देवघर में माता का हृदय गिरा था. जिसकी वजह से इसको भी शक्ति पीठ के रुप में पूजा जाता है. जब एक-एक कर शरीर के अंग कटकर गिर गये. तब भोलनाथ का क्रोध शांत हुआ. बाबा भोलेनाथ का माता सती के प्रति वियोग को देखकर भगवान बिष्णु ने ही माता से मिलन करवाने का भोलेनाथ को वचन दिया.
रावण की वजह से देवघर में बसे भोलेनाथ
आप सबको पता है कि लंकापति रावण भोलेनाथ का सबसे बड़ा भक्त था. एक बार उसने भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए एक-एक कर अपने शीश काटकर भोलेनाथ को चढ़ाने लगा. जिससे भगवान ने खुश होकर वरदान मांगने को कहा. तब रावण ने माता पार्वती की सबसे प्रिय शिवलिंग को लंका ले जाने का वरदान मांगा. मजबूरी में भगवान को तथास्तु कहना पड़ा. लेकिन भगवान ने रावण के सामने एक शर्त रख दी कि लंका पहुंचने से पहले कही भी धरती पर इस लिंग को रखने पर लिंग वहीं स्थापित हो जायेगा.
भगवान बिष्णु ने रावण के साथ किया था छल
भगवान भोले कभी भी लंका में नहीं रहना चाहते थे. संकट की घड़ी में शंकर भगवान अपने गुरु विष्णु की शरण में गये. तब भगवान बिष्णु ने एक तरकीब निकाली. रास्ते में रावण को लघुशंका लग गई. अब रावण किसी ऐसे की तलाश करने लगा. जिसको शिवलिंग सौंपकर वो लघुशंका करने जा सके. तभी भगवान बिष्णु एक चरवाहा की भेष में रावण के सामने प्रकट हुए. रावण ने शिवलिंग देकर उसके आने से पहले धरती पर नहीं रखने का आग्रह किया.
पहले भगवान राम और सीता ने शिवलिंग पर जलार्पण किया
रावण जैसे ही वहां से गया. भगवान बिष्णु ने शिवलिंग को ठीक उसी जगह पर रख दिया. जहां माता सती का हृदय गिरा था. इस तरह भगवान बिष्णु ने भोलेनाथ से किया वादा को पूरा किया. और शिव और शक्ति को मिलाया. सबसे पहले यहां भगवान राम और माता सीता ने शिवलिंग पर जलार्पण किया. तब से यहां सावन में जलार्पण करने की परंपरा की शुरुआत हुई.
नोट:ये सारी जानकारी पुरानी मान्यताओं पर आधारित है.
रिपोर्ट-प्रियंका कुमारी
