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पेड़ों से कंक्रीट के जंगल में कैसे बदल गया इलाका, जानिये धनबाद के वासेपुर की कहानी

BY -
Shahroz Quamar
Shahroz Quamar
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 14, 2026, 7:02:10 AM

टीएनपी डेस्क (TNP DESK): संकरी गलियां कब किस आंगन में खुल जाएंगी पता नहीं चलता. यदि आप इलाके में पहली बार आए हैं, तो चलते-चलते आप थक जाएंगे, लेकिन घुमावदार गलियों का जाल खत्म नहीं होगा. पौ फटने के साथ कहीं से मुर्गे कि कुकरुं कूं तो कहीं से बकरी के मिमयाने की आवाज. बात वासेपुर की है. वही वासेपुर जिसने एक फिल्म ने समूची दुनिया में उसकी अलग ही छवि बना दी गई. उस फिल्म के नाम से आप सभी परिचित ही होंगे "गैंग्स ऑफ वासेपुर." हम आपको धनबाद के इस इलाके की अलग ही कहानी आज बताते हैं.

बात 1955 की है. तब धनबाद छोटा सा कस्बाई शहर था. मुख्य आबादी से एक किलोमीटर दूर वीरान जंगली इलाका था. अब्दुल वासे और एमए जब्बार दो भाई रांची से धनबाद आए थे. एमए जब्बार पेशे से कॉन्ट्रैक्टर थे. जबकि उनके बड़े भाई अब्दुल वासे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग कर चुके थे. ये दोनों भाई रांची के मशहूर वकील सैयद अनवर हुसैन के मौसेरे भाई और एडवोकेट सैयद मोहिउद्दीन अहमद ऊर्फ बन्नू बाबू के भांजे थे. इन दोनों भाई ने 1940 में रांची से अपना सफ़र शुरू किया था. धनबाद आकर मिलिट्री कैंटीन के कॉन्ट्रैक्ट लेने लगे. बाद में कोयला के बड़े-बड़े ठेके लेने लगे. भूली में बीसीसीएल की हाउसिंग टाउनशिप के निर्माण में भी इनकी भूमिका रही. इन दोनों भाइयों ने एक किलोमीटर दूर इस इलाके की जमीन खरीद ली. तब यहां छिटपुट आदिवासी आबादी थी. इसे कोयला खदानों और कंपनियों के मजदूर-कामगारों को बसाना शुरू किया. जंगल कटने लगे. घर बनने लगे. शुरू में लोग इतनी दूर आने से कतराते थे. लेकिन धीरे-धीरे आबादी बसने लगी. अब मोहल्ले या इस गांव को कहा क्या जाए. इसे लोग जब्बार नगर कहने लगे. लेकिन जब्बार ने इसका नाम अपने बड़े भाई के नाम पर वासेपुर कर दिया.

पहले जहां 100 लोग ही रहते थे अब वासेपुर की आबादी करीब एक लाख है. इन भाइयों के पास अपार दौलत थी. वासेपुर में इनकी बनवाई आलीशान कोठी इसकी तस्दीक़ करती है. कोठी सेंट्रलाइज्ड एयर कंडीशंड थी. वासेपुर में आज भी जब्बार कैंपस है. जब्बार मस्जिद है. लोग कहते हैं कि इन भाइयों के पास तब डॉज और प्लायमाउथ जैसी गाडियां हुआ करती थीं. अब्दुल वासे के भांजे मोहम्मद इनायतुल्लाह अफसर उर्फ बाबू भाई के बक़ौल उनके मामा ने शहर से दूर शांत और सुरम्य इलाके में वासेपुर को बसाया था. खुद भी रहते थे. लेकिन 1975 के बाद इलाके में जुर्म बढ़ने लगा. दो परिवारों के बीच गैंगवार शुरू हो गया. आबादी बढ़ती चली गई और शांति खत्म हो गई. अब वासेपुर कंक्रीट का जंगल बन गया है. एमए जब्बार, एमए वासे और इनकी पत्नियों की यहीं मौत हुई. जब्बार कैंपस क़ब्रिस्तान में ही सभी दफ़न हैं.

Tags:News

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