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उदाहरण! कलयुग के श्रवण कुमार ने माता-पिता को बहंगी पर बैठ कर करवाया तीर्थाटन, वृद्ध दंपत्ति ने भोलेनाथ के दर्शन की जताई थी इच्छा

BY -
Shreya Gupta
Shreya Gupta
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 13, 2026, 10:58:33 AM

दुमका (DUMKA): त्रेता युग में एक श्रवण कुमार की कहानी आज के समय में हम अपने बच्चों को सुनाकर नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाते हैं. श्रवण कुमार ने बहंगी में बैठा कर अपने माता-पिता को तीर्थाटन कराया था. बच्चों को समझाते हैं कि माता-पिता की सेवा सर्वोपरि है. आज हम आपको कलयुग के एक नहीं तीन श्रवण कुमार की कहानी बताने जा रहे हैं.

कलयुग के श्रवण कुमार की कहानी

कलयुग के एक श्रवण कुमार अपने माता पिता को बहंगी में बैठाकर दुमका के बासुकीनाथ धाम पहुंचे. बिहार के भागलपुर के सुल्तानगंज के शिवनन्दनपुर निवासी सुवित यादव और सुमित्रा देवी ने एक नहीं तीन तीन श्रवण कुमार को जन्म दिया. उम्र की अंतिम दहजील पर पहुंच चुके वृद्ध दंपत्ति की इच्छा थी कि वह देवघर के बाबा बैद्यनाथ और दुमका के बाबा बासुकीनाथ में पूजा अर्चना करें. लेकिन, शारीरिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वे पूजा कर सकें. लेकिन दंपत्ति के तीनों बेटों ने मिलकर श्रवण कुमार की भूमिका निभाते हुए माता-पिता को तीर्थाटन कराया. तीनों पुत्र कंत लालयादव(मंतीबाबा), सुबोध यादव और पवन यादव ने मिलकर सुल्तानगंज के उत्तरवाहिनी गंगा से जल भरा और माता पिता को बहंगी में बैठा कर देवघर और बासुकीनाथ के लिए निकल पड़े. दो बेटे बहंगी को कंधा देते रहे तो तीसरे बेटे साईकल पर सारा सामान रख कर साथ-साथ पैदल चलता रहा. बारी-बारी से बहंगी को कांधे पर लेकर 28वें दिन कलयुग के श्रवण कुमार देवघर पहुंचे. माता-पिता के साथ बाबा बैद्यनाथ की पूजा अर्चना की. फिर देवघर से बासुकीनाथ धाम के लिए निकल पड़े. 12वें दिन दुमका के बासुकीनाथ धाम पहुंचे और यहां पूजा अर्चना की. 40 दिनों की कठिन यात्रा में पांव में छाले पड़े. लेकिन, चेहरे पर शिकन तक नहीं. इस बात की खुशी थी कि श्रवण कुमार बनकर अपने माता-पिता की इच्छा को पूरी की.

माता-पिता को समझते बोझ

अब सवाल उठता है कि जब त्रेतायुग के श्रवण कुमार आज भी हमारे समाज में आदर्श माने जाते हैं. कलयुग में भी कई ऐसे श्रवण कुमार की कहानी देखने और सुनने को मिलती है, मगर वहीं फिर आज के समय में महानगर से लेकर छोटे-छोटे शहरों में वृद्ध आश्रम की संख्या भी बढ़ रही है जो बुढ़ापे में हम अपने माता-पिता को बोझ समझने लगते हैं. जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर जब माता-पिता को सबसे ज्यादा जरूरत अपनी संतान की होती है. उस उम्र में उन्हें वृद्धाश्रम क्यों जाना पड़ता है. अगर सचमुच हमारा समाज त्रेता युग के श्रवण कुमार को आदर्श मानते हुए उनके बताए मार्ग पर चलने लगे तो शायद वृद्ध आश्रम की जरूरत नहीं पड़ेगी.

रिपोर्ट: पंचम झा, दुमका

 

Tags:News

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