धनबाद(DHANBAD): धनबाद में सरकारी शिक्षा का हाल देखिए हुजूर! जब भी मौका मिले धनबाद आकर जरूर करिए समीक्षा, धन से आबाद धनबाद जहां DMFT फंड में 12 सौ करोड़ से अधिक रुपए पड़े हैं, वहां की सरकारी शिक्षा व्यवस्था कैसे डगमगा रही है. इसे जानने के लिए एक उदाहरण ही काफी है. धनबाद के 159 स्कूलों में 25 से कम बच्चे है. इतना ही नहीं ,50 से कम छात्र वाले स्कूल 419 हैं. इस आशय की रिपोर्ट मुख्यालय को धनबाद से गई है. अब देखना दिलचस्प होगा कि सरकार के स्तर पर क्या कुछ निर्देश मिलता है.
क्या कहती है you dias Plus की रिपोर्ट
वैसे you dias Plus की रिपोर्ट के मुताबिक धनबाद के 323 स्कूलों में बच्चों की संख्या में लगातार घट रही है. आपको बता दें कि धनबाद जिले में बच्चों को स्कूल से जोड़ने का कार्यक्रम बहुत कारगर साबित नहीं हो रहा है. इसके कई कारण गिनाए जा सकते हैं. कोरोना काल भी एक महत्वपूर्ण कारण हो सकता है. वैसे, जानकार बताते हैं कि बच्चों को स्कूल से जोड़ा जाता है लेकिन 2-4 -10 दिनों के बाद ही वह स्कूल आना बंद कर देते हैं और अपने माता- पिता के साथ रोजी -रोजगार में जुट जाते हैं. इसमें कोयला चुनना भी एक प्रमुख पेशा बताया जाता है. धनबाद में ऐसे भी स्कूल है, जहां केवल एक शिक्षक प्रतिनियुक्त हैं. जबकि अमूमन 25 से 30 बच्चों पर एक शिक्षक की प्रतिनियुक्ति होनी चाहिए.
शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति भी अन बैलेंस
कई कई स्कूलों में तो इस आंकड़े से इतर शिक्षकों की अधिक प्रतिनियुक्ति है तो काम भी है. हालांकि अब इस ओर सरकार का ध्यान गया है और हो सकता है कि प्रतिनियुक्ति को बैलेंस किया जाए. लेकिन अभी इसमें समय लग सकता है. उपलब्ध आंकड़े के मुताबिक धनबाद में 1 से 8 तक के 1727 स्कूल हैं. जबकि उच्च विद्यालयों की संख्या 118 है. धनबाद जिले में सरकारी शिक्षकों की संख्या 3601 है ,जहां सहायक अध्यापकों की संख्या (जिन्हें पहले पारा टीचर कहा जाता था) 2575 हैं.
2,000 से अधिक पद रिक्त पड़े हैं
इतना ही नहीं प्राइमरी, मीडिल और हाई स्कूल मिलाकर 2,000 से अधिक पद रिक्त हैं. सबसे तकलीफ की बात है कि धनबाद की बिगड़ी शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ कभी आवाज नहीं उठती है. कोयले की लोडिंग और रंगदारी के लिए सब कुछ होता है लेकिन शिक्षा के इस बिगड़े हालात पर किसी जनप्रतिनिधि का मुंह नहीं खुलता है. दूसरी ओर पेट काटकर भी धनबाद के लोग अपने बच्चों को निजी स्कूल में पढ़ाने को बाध्य है. नतीजा है कि निजी स्कूलों की मनमानी अपने ढंग से चलती रहती है. कोरोना काल की फीस को लेकर बहुत हंगामा हुआ लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात ही रहा.
