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मांदर की थाप और सखुआ की खुशबुओं के साथ आज मनाया जा रहा ‘सरहुल’, निकाली जाएगी शोभायात्रा, जानें इसकी मान्यताएं और परंपरा

BY -
Shivani CE
Shivani CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 12, 2026, 9:17:18 AM

टीएनपी डेस्क (TNP DESK): आज आदिवासी समुदाय का प्रकृति पर्व ‘सरहुल’ है. झारखंड समेत आज विभिन्न आदिवासी बहुल क्षेत्रों में यह त्योहार धूमधाम से मनाई जाएगी. सरहुल झारखंड के मुख्य त्योहारों में से एक है. आदिवासी समुदाय हर्षोल्लास के साथ आज सरहुल शोभायात्रा निकालेंगे. सरहुल का त्योहार हर वर्ष चैत्र के महीने के तीसरे दिन मनाया जाता है. सरहुल पर्व के दिन पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार प्रकृति की आराधना की जाती है. सरहुल का पर्व आदिवासी समुदाय के लिए नया साल ले कर आता है. आज मांदर की थाप पर अखाड़े में पारंपरिक नृत्य किए जाएंगे.

सरहुल का अर्थ

झारखंड का मुख्य त्योहार सरहुल दो शब्दों से मिलकर बना है सर और हूल. जिसमें सर का अर्थ सखुआ या साल का फूल और हूल का अर्थ क्रांति है. सरहुल को सखुआ फूल की क्रांति का पर्व भी कहा जाता है. सरहुल प्रकृति का पर्व है. योंकी, पतझड़ के बाद प्रकृति नए पत्तों और फूलों से सजने लगती है. आम के मंजरी, पेड़ों पर तरह-तरह के नए फूल आने लगते हैं. प्रकृति को खुद को संवारने लगती है. पेड़ों पर फूल खिलने के साथ-साथ नए साल का स्वागत किया जाता है.

सरहुल का महत्व और परंपरा 

सरहुल का अर्थ ही प्रकृति से जुड़ा हुआ है. ऐसे में प्रकृति का प्रतीक माने जाने वाले साल वृक्षों की विशेष पूजा की जाती है. पवित्र स्थल सरना स्थल पर जाकर पारंपरिक विधि-विधान से पूजा की जाती है. पूजा गांव के “पाहन” (पुजारी) द्वारा की जाती है. पाहन साल वृक्ष की डालियों से विधि-विधान से आदिदेव सींग बोंगा की आराधना करते हैं और समुदाय के लिए सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं. पूजा के दौरान पाहन द्वारा पर्व के पहले दिन रखे गए घड़े के पानी को देखकर वर्षा की भविष्यवाणी करते हैं. पाहन द्वारा बताया जाता है की साल में वर्षा कितनी होगी. वहीं, सिर्फ साल की वृक्षों की ही नहीं बल्कि आज नदी, तालाब, वन और धरती की भी पूजा की जाएगी. साथ ही इनके संरक्षण का संकल्प समुदाय द्वारा लिया जाएगा.

सरहुल पर्व की लोकनृत्यों की मान्यता

‘जे नाची से बांची’ यानी जो नाचेगा वही बचेगा. सरहुल पर्व में लोक नृत्यों को लेकर भी मान्यता है की हमारी लोक नृत्य ही हमारी सभ्यता है और संस्कृति है. महिलायें-पुरुष इस दिन अपने पारंपरिक वेशभूषा में मांदर की थाप में लोकनृत्य करते हैं. पारंपरिक पेय पदार्थ हड़िया और व्यंजन का सेवन करते हैं और धूमधाम से इस पर्व को मनाते हैं.

निकाली जाएगी शोभायात्रा

सरहुल के मौके पर सरहुल शोभायात्रा निकाली जाएगी. शोभायात्रा विभिन्न जगहों से घूमते हुए पवित्र स्थान सरना स्थल पहुंचेगी. जहां फिर पूजा-अर्चना की जाएगी. बता दें कि, झारखंड में पहली शोभायात्रा साल 1962 में राजधानी रांची में निकाली गई थी. लेकिन साल 1980 में इसका नवयुग था. क्योंकि, उसी दौरान जनजातीय और क्षेत्रीय विभाग की स्थापना की गई थी. जिसके बाद से लोग अपने-अपने पारंपरिक तरीकों से ढोल, मांदर, नगाड़ा लेकर और शोभायात्रा निकालने लगे.

 

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